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अमन को निशाना बनाने वाले

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श्रीनगर के सीआरपीएफ कैंप के नजदीक हुआ आतंकी हमला सिर्फ सुरक्षा या खुफिया व्यवस्था की चूक का नतीजा नहीं है। यह हमला दिखाता है कि कुछ समय की शांति की वजह से आई सुस्ती तथा स्थानीय कारणों से उपजी परिस्थितियों का आतंकवादी कैसे फायदा उठा सकते हैं। वहां हालात किस तरह सुधर रहे थे, यह इसी से पता चलता है कि आतंकियों ने भारतीय जवानों को खेल के मैदान में निशाना बनाया।
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इस हमले की पृष्ठभूमि में दो घटनाओं का जिक्र करना जरूरी लग रहा है। पहली घटना जनवरी में नियंत्रण रेखा के नजदीक पाकिस्तानी फौजियों और आतंकियों द्वारा दो भारतीय जवानों का गला रेतने से संबंधित है और दूसरी अफजल गुरु को दी गई फांसी से। भारतीय सैनिकों के साथ हुई बर्बरता के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से दो टूक कहा था कि उसके साथ संबंध पहले जैसे नहीं रह सकते।

जाहिर है, इसी वजह से अजमेर जियारत करने आए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री राजा परवेज की यात्रा को सरकार की ओर से खास तवज्जो नहीं दी गई। मगर सवाल यह है कि आखिर हमारी सरकार पाकिस्तान पर ऐसा दबाव क्यों नहीं बना पा रही है कि वह अपनी सीमा से भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को संचालित न होने दे? आखिर हम इस मौके का फायदा क्यों नहीं उठा पा रहे हैं कि पाकिस्तान में पहली बार कोई लोकतांत्रिक सरकार कार्यकाल पूरा करने जा रही है?
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ऐसी परिस्थितियों में जब अफगानिस्तान से अमेरिका और नाटो फौजों की वापसी की तैयारी हो रही है और हाफिज मोहम्मद सईद जैसे लोग कश्मीर में अपना ऑपरेशन तेज करने की धमकी दे रहे हों, तब पाकिस्तान पर दबाव बनाना और भी जरूरी लग रहा है। कश्मीर में पंचायत प्रतिनिधियों को मिल रही धमकियों को भी इसी समग्रता के साथ देखने की जरूरत है।

अफजल गुरु की फांसी के बाद कश्मीर के हालात लगातार चिंताजनक होते जा रहे हैं, इसका फायदा आतंकवादी उठा सकते हैं। जिस तरह के हालात हैं, उसमें सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस और विपक्षी पीडीपी सहित तमाम राजनीतिक दलों के बीच भी समन्वय की दरकार है, मगर हो रहा ठीक इसका उल्टा। उन्हें समझना चाहिए कि इस नाजुक दौर में संयम की जरूरत है।
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