लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में करीब एक पखवाड़ा रह गया है, इसके बावजूद दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों का अब तक घोषणापत्र जारी न करना क्या बताता है? यही कि नीतियों और लक्ष्यों के बजाय चेहरों और चुनावी समीकरणों पर ही इन्हें ज्यादा भरोसा है।
उनके इस भरोसे के पीछे यह खतरनाक सोच है कि भारतीय मतदाता सरकार के कामकाज को उतनी तरजीह नहीं देते। चूंकि घोषणापत्रों के हवाई वायदे जमीनी हकीकत से अलग होने के कारण चुनाव आयोग की सतर्क निगाहों में भी आएंगे, इसलिए भी शायद कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां ठोक-बजाकर घोषणापत्र जारी करना चाहती हैं।
लेकिन यह क्यों न मानें कि इन पार्टियों के लिए घोषणापत्र का आनुष्ठानिक महत्व ही है। अलबत्ता जिन राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं, उन्हें कितनी गंभीरता से लिया जाए? अन्नाद्रमुक ने बहुत पहले इस दिशा में पहल की थी। केंद्र की सत्ता में आने पर जहां उसने पूरे देश के मतदाताओं को मुफ्त में मिक्सर-ग्राइंडर बांटने का वायदा किया है, वहीं उसके घोषणापत्र में दस करोड़ रोजगार और स्वतंत्र तमिल ईलम के गठन का दावा भी है। इस घोषणापत्र में मतदाता को अपने एजेंडे के प्रति आश्वस्त करने के बजाय लालच देने का भाव ही है।
माकपा का घोषणापत्र तुलनात्मक रूप से संतुलित है, जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य पर जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करने का वायदा है। लेकिन नंदीग्राम और सिंगुर में किसानों से जबरन जमीन छीनने वाली पार्टी को अब इस मामले में किसानों की सहमति की जरूरत याद आई है! ठेठ बंगाल की राजनीति करने वाली तृणमूल कांग्रेस ने 'रोटी, कपड़ा और मकान' के पुराने नारे के जरिये राष्ट्रीय राजनीति में वैसी ही दखलंदाजी का इरादा जताया है, जैसा अन्नाद्रमुक जता रही है।
जयललिता की तरह ममता बनर्जी ने भी घोषणापत्र में विदेश नीति और अर्थनीति पर अपनी पार्टी का नजरिया सामने रखा है। लेकिन जो सरकार पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था को उबारने में कामयाब नहीं हो पाई है, उससे राष्ट्रीय स्तर पर कोई किस स्तर की अर्थनीति की उम्मीद करेगा? ये घोषणापत्र इन्हें जारी करने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए मुफीद हो सकते हैं, लेकिन मतदाताओं के लिए इनका बहुत महत्व शायद ही है।