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धारा 66 ए की विदाई

Tue, 24 Mar 2015 08:35 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी ऐक्ट) की विवादास्पद धारा 66 ए को रद्द कर संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ही नया आयाम दिया है। दरअसल इंटरनेट के बढ़ते दायरे के साथ ही उसके जरिये प्रसारित होने वाली अथाह सामग्री को नियंत्रित करने के लिए कानून की जरूरत महसूस की गई थी, जिसके फलस्वरूप आईटी ऐक्ट अस्तित्व में आया। मगर इसकी धारा 66 ए को ठीक से परिभाषित नहीं किए जाने के कारण सरकारों और पुलिस को सोशल नेटवर्किंग या अन्य साइट्स पर कथित आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का मनमाना अधिकार मिल गया था। यहां तक कि ऐसी सामग्री को सिर्फ 'लाइक' करने वालों तक को जेल की हवा खानी पड़ी है!
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वास्तव में इंटरनेट ने अभिव्यक्ति का नया मंच प्रदान करने के साथ ही राजनीतिक जनमत बनाने का काम भी किया है। देश में आज 30 करोड़ से अधिक लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं, जिनमें युवाओं की संख्या अधिक है। इस ताकत को सोशल नेटवर्किंग साइट्स का बखूबी इस्तेमाल करने वाले प्रधानमंत्री मोदी से बेहतर भला कौन जान सकता है! यह भी सच है कि जिन मामलों की वजह से धारा 66 ए पर सवाल उठे, वे राजनीति से ही कहीं अधिक प्रेरित थे। फिर वह शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की अंत्येष्टि को लेकर की गई पोस्ट हो या कार्टून शेयर करने का मामला।

शीर्ष अदालत ने 66 ए को लोगों के जानने के बुनियादी अधिकार का हनन बताया है। उसने आईटी ऐक्ट की धारा 79 (3) (बी) को भी नए ढंग से परिभाषित करने की बात की है, जिससे इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट प्रदाता कंपनियों को राहत मिलेगी, क्योंकि इसकी आड़ में सरकारें उन पर नकेल कसती रही हैं। शीर्ष अदालत का फैसला सरकारों और राजनीतिक वर्ग के लिए ही नहीं, बल्कि नैतिकता के स्वयंभू झंडाबरदारों के लिए भी कड़ा संदेश है। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का यह मतलब नहीं है कि दूसरों की भावनाओं को आहत किया जाए। इसके साथ ही यह समझने की भी जरूरत है कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है, बल्कि वह कानून और संविधान के दायरे में है।
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