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पंद्रहवीं लोकसभा का हासिल

Fri, 21 Feb 2014 08:49 PM IST
नई दिल्ली
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दो हजार वर्ष पूर्व प्लेटो ने सुकरात से पूछा था कि एथेंस का सबसे बड़ा संकट क्या है? सुकरात का जवाब था, शब्दों का अंधाधुंध प्रयोग! पंद्रहवीं लोकसभा के समापन पर इस यूनानी दार्शनिक की कही बातों के निहितार्थ को समझा जा सकता है। इस लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन सदस्यों ने एक दूसरे के प्रति सद्भाव का प्रदर्शन जरूर किया और संसद की गरिमा की दुहाई दी, लेकिन यह भी सच है कि देश के संसदीय इतिहास की यह अब तक की सबसे लाचार लोकसभा साबित हुई है, जिसने सबसे कम विधायी कार्य करने का रिकॉर्ड स्थापित किया है।
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हैरान नहीं होना चाहिए कि इस लोकसभा में देश की पहली लोकसभा की तुलना में तकरीबन आधी बैठकें ही हो सकीं! निश्चय ही इस लोकसभा में भूमि अधिग्रहण, लोकपाल एवं लोकायुक्त, खाद्य सुरक्षा, यौन उत्पीड़न और शिक्षा के अधिकार साथ ही देश के 29वें राज्य तेलंगाना के गठन से संबंधित महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने का श्रेय जाता है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि अब भी अकेले लोकसभा में ही 70 से अधिक विधेयक लंबित हैं।

हैरानी की बात है कि लोकसभा में मीरा कुमार, सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज तीन शीर्ष नेत्रियों की मौजूदगी के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक फिर लटक गया। यहां तक कि आखिरी सत्र में सिर्फ एक दिन ही प्रश्नकाल हो सका। बेशक सदन के भीतर तेलंगाना मसले पर मिर्च स्प्रे की घटना अपवाद कही जा सकती है, लेकिन चिंता की बात है कि सदन में सदस्यों के व्यवहार में लगातार गिरावट आती जा रही है।
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संसद में होने वाली बहस के स्तर की तो बात ही छोड़ देनी चाहिए। मगर जिस तरह से खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में तृणमूल कांग्रेस की समर्थन वापसी के बाद सरकार ने द्रमुक का समर्थन जुटाया; और तेलंगाना के मामले में जिस तरह से ना-नुकर के बाद भाजपा साथ आ गई, उससे यह तो समझ में आता है कि सदन में हंगामा चाहे जितना हो, पर्दे के पीछे भी कई खेल होते हैं।

पंद्रहवीं लोकसभा के समापन पर देश की पहली लोकसभा के सदस्य रहे और अभी राज्यसभा से रुखसत हो रहे देश के सबसे बुजुर्ग सांसद रिशांग किशींग की इस बात पर गौर करना चाहिए कि सदन में सदस्यों का व्यवहार ट्रेड यूनियन नेताओं जैसा होता जा रहा है, कोई किसी की बात नहीं सुनता। वह अगली संसद में नहीं रहेंगे, लेकिन कोई क्या कोई उनकी बातों पर गौर करेगा?
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