अपने कार्यकाल से दो वर्ष पूर्व चुनाव कराने वाले श्रीलंका के निवर्तमान राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे लगता है कि अपने एक दशक लंबे शासन के विरुद्ध पनप रही लोगों की नाराजगी और विपक्ष की साझा रणनीति का अंदाजा नहीं लगा पाए। दो महीने पहले तक उनके मंत्रिमंडल का सदस्य रहे मैत्रीपाला सिरिसेना ने उन्हें शिकस्त दी है। तमिल लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खिलाफ की गई भीषण सैन्य कार्रवाई के बाद से तमिल बहुल क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के निशाने पर थे।
मगर 25 बरस चले गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद हुए 2009 के चुनाव में सिंहली बहुसंख्यकों के दम पर राजपक्षे दूसरी बार चुनाव जीतने में सफल हुए थे। इसके बावजूद तमिलों को जिस तरह की यातनाएं दी गईं, उसके चलते राजपक्षे को अपने तकरीबन हर प्रवास के दौरान भारत में भी भारी विरोध झेलना पड़ा। वास्तव में राजपक्षे के पास अपने दूसरे कार्यकाल में लिट्टे के सफाए के अलावा कोई दूसरी उपलब्धि नहीं थी। वहीं उनका दूसरा कार्यकाल कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार की मिसाल बन गया। हालत यह थी कि प्रदेश के पांच प्रमुख मंत्रालय राजपक्षे और उनके भाइयों के पास थे, जिनकी देश के बजट में 70 फीसदी की हिस्सेदारी होती है!
लेकिन बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर लोगों की नाराजगी उनके राज के लिए आखिरी कील साबित हुई। सिरिसेना के राष्ट्रपति बनने से बड़ा परिवर्तन श्रीलंका की विदेश नीति में दिख सकता है। राजपक्षे के शासन में इस क्षेत्र में न केवल चीन का दखल बढ़ा है, बल्कि वह श्रीलंका में दो अरब डॉलर का निवेश कर एक बड़ा बंदरगाह भी बना रहा है। चीन की इस चहलकदमी को भारत अपने लिए चुनौती मानता रहा है।
अब स्थिति बदल सकती है। खुद सिरिसेना ने भारत सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ बेहतर रिश्ते के संकेत दिए हैं। सिरिसेना को उदार माना जाता है। इसका एक प्रमाण यही है कि उन्हें मुस्लिम और तमिल बहुल क्षेत्रों में भी खासे वोट मिले हैं। वास्तव में यह भारत के लिए भी इस द्वीपीय देश के साथ अपने रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित करने का मौका है।