किसी अच्छे लोक कलाकार के लिए यह बिडंबना होती है कि अपनी कला संगीत की तमाम निपुणता के बावजूद वह एक क्षेत्र विशेष के दायरे में सिमट कर रह जाता है। बहुत कम लोक कलाकार ऐसे होते हैं जिन्हें समाज इस स्तर पर चर्चा मिल पाती है कि वे राष्ट्रीय फलक पर जाने जाएं। चंद्र सिंह राही जैसे साधक कलाकार के योगदान को राष्ट्रीय क्षितिज पर स्वीकार किया जाना चाहिए था। लेकिन वह अपने उत्तराखंड में सिमट कर रह गए, जिस स्तर पर शारदा सिन्हा, भूपेन हजारिका, या तीजन बाई जैसे कलाकारों को अपनी लोककला और गायकी के बदौलत राष्ट्रीय स्तर पर जाना पहचाना गया, लोकगायन, लोकवादन के लिए अपनी बेहद सार्थक भूमिकाओं के बावजूद राही उस उपलब्धि से वंचित रह गए।
दिल्ली के निगम बोध घाट में जलती एक चिता जिस लोकसाधक को पंचतत्व में विलीन कर रही थी, वह उत्तराखंड के लगभग सभी परंपरागत साजों का ज्ञाता था। वह एक तरह से लोकसंस्कृति और लोकगीतों के लिए किसी वटवृक्ष की तरह थे। साठ के दशक में रेडियो में जब लोगों ने पहले पहले उनके गीत सुने तो वे गीत किसी लोकगीत की तरह हो गए। इसके बाद वह हर बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में अपने हुड़के के साथ होते थे।
समय बदला लेकिन अपने संगीत में परंपरागत साजों को नहीं बदला। लोकगीतों की मौलिकता को बरकरार रखा। उन्होंने जिन गीतों को गाया उनमें पहाड़ों की खूशबू थी, वहां का जीवन था। उन्होंने अपने गीत बहुत सहजता से गाए। पीढियां बदलती गई, लेकिन जुन्यली राता कौ सुणलो, हिलमा चांदी को बटन, सतपुली का सैणा जैसे गीत हमेशा बने रहे। चंद्र सिंह राही ने उत्तराखंड में लोकंसस्कृति और जागर की विधा को बचाने के लिए अथक काम किया। उन्होंने ढाई हजार से ज्यादा गीतों का संकलन किया था। वे इसे एक लोकगीतों के ग्रंथ के तौर पर लाना चाहते थे। इसके लिए वह प्रयास रत थे। पौड़ी जिले के गिंवाली गांव में जन्मे चंद्र सिंह राही के मन में बचपन से ही लोकगीतों की ओर रम गए थे।
लोकपरंपरा में मिले लोकगीतों की तरफ उनका गहरा रुझान हुआ। इस विधा में पारंगत होने के लिए उन्होंने कई पहलुओं पर एकाग्र साधना की। उन्होंने लोकगीतों के मर्म को समझा। शास्त्रीयता की समझ विकसित की। साथ ही पहाड़ो के परंपरागत साजों को सीखा। उत्तराखंड का शायद ही कोई ऐसा साज हो जिसे उन्होंने न बजाया हो। और हुड़का की तो बात ही क्या। उन्हें हुड़का के साथ गाते हुए सुनना एक दिव्य अनुभव से गुजरने की तरह था। उनके अंगुलियों की थाप पर हुड़का और मीठा बोलने लगता था।
हुड़का ही नहीं डौंर थाली, बांसुरी, हारमोनियम, मशकबीन ढोल हर साज को वह बखूवी बजाते थे। जहां लोकसंगीत में नए साजों का इस्तेमाल हुआ, उसमें नए शब्द गढ़े गए उनका हमेशा परंपरा और मौलिकता के लिए आह्वान रहता था। अपने आयोजनों में वह हमेशा अपने परपरागत साजों के साथ उपस्थित होना ठीक समझते थे। सिथेंसाइजर को लेकर उनके मन में खिन्नता का भाव रहता था।
लोकसंस्कृति और चेतना के वाहक केशव अनुरागी और कन्हैया लाल डंडरियाल के सानिध्य में आकर उन्होंने पहाड़ों की जिंदगी को गहरे महसूस किया। उन्होंने यहां की प्रकृति में सौंदर्य़ और आध्यत्मिकता की गूढ़ता को समझा। पहाड़ों के रीति रिवाज, कौथिग मेले, उत्सव के पीछे के भाव को आत्मसात किया। इसलिए जब वह पहाड़ों के लिए गीत संगीत को लेकर सामने आए तो उनके पास सहज सरल शब्दों में ऐसे गीत थे, जो लोगों के मन में उतरते गए। वे गीत जनगीत बन गए। साढ के दशक में उन्होंने जब ढेबरी ( बकरी) को लेकर एक गीत बनाया तो लोगों को मंत्रमुग्ध कर गया।
पूर्वी नयार सतुपुली के लिए विपदा भी लाई थी। लेकिन इस नयार के पास पास लोगों ने अपना जीवन भी देखा। चौंदकोट के चंद्रसिंह राही को सतपुली पर गीत बनाना ही था। आज भी बहुत भावुकता केसाथ सुना जाता है सतपुली का सैणा। राही जी के, जरा ठंडो चला दी, भाना रे रंगीली भाना, हिमला चांदी को बटन, सौली घुर जैसे गीत बहुत रुझान से साठ और सत्तर के दशक में रेडियो लखनऊ और नजीमाबाद आकाशवाणी से सुने जाते थे। बाद में राही लोकमंचों पर अपने कार्य़क्रम प्रस्तुत करने लगे। हल्दावानी इसके साथ ही दूसरे लोकगीतों को भी गाया करते थे।
विश्व युद्ध में उत्तराखंड के उन युवाओं ने जिन्होंने ऋषिकेश और भी नहीं देखा था, उन्हें फ्रांस और जर्मन में लड़ने के लिए जाना पडा तो कई उस मार्मिक क्षणों को लेकर कई लोकगीत बने। राहीजी बहुत तन्मयता से सुनाया करते थे, सात समुंदर पार च जाण ब्वै( मां मुझे सात समुंदर पार युद्ध के लिए जाना है )। इसी तरह कुमाऊं में हीरा सिंह राणा के लिखे स्वर्गतारा जुन्यली राता जैसे प्रेम गीत को राही अपनी ढपली बजाकर सुनाया करते थे। राहाजी के कंठ में कुदरती आंचलिकता का प्रवाह था। उनके पास मौलिक ट्यून थी। खासकर किसी गीत में उनका अलाप लेना सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
उत्तराखंड में लोक संगीत की अपनी परंपराओं में प्रकृति सौंदर्य, दैवीय उपासना परंपरा और लोकजीवन को लेकर गीत बने। लेकिन विश्व युद्ध और उसके बाद चीन और पाक युद्ध के कारण यहां के सैन्य परंपराओं पर बहुत गीत बने। बिछोह वेदना पर हदृयस्पर्शी गीतों की एक बयार सी चली। लगातार होते पलायन और यहां के कठिन संघर्ष के बीच पहाड़ों की महिलाओं की भावनाओं पर मन को झकझोरते गीत यहां के सुख-दुख के साथी बने। यहां के काफू, घुघती जैसे पक्षी गीतों में संवाद के साथी बने, हिलांस, बुरांस, काफल, तिमला बेडू जैसे पेड़ गीतों में प्रतीक बने।
हिमालय की शुभ चोटियों पर अथाह गीत लिखे गए। ऐसे माहौल में राही ने गीत संगीत को नई ऊंचाइयां दी। उत्तराखंड की लोकपरंपरा में जागर विधा की वह तह में गए। जागर और ढोल सागर के गूढ़ तत्वों की वह लोकमंचों पर व्याख्या करते थे। वह गीत संगीत में तो रमे ही थे।
राष्ट्रीय फलक पर संस्कृत कर्मियों से मिलते रहना उन्हें अच्छा लगता था। एकदम सहज थे, बीमारी की हालत में भी अस्पताल में रहते हुए एक मरीज के कहने पर उन्होंने भजन सुनाया तो वहां सांस्कृतिक आयोजन सा हो गया। प्रसिद्ध संगीतकार कल्याणजी उनके संगीत ज्ञान पर मुग्ध हुए थे और परंपरागत साजों पर कुछ जानकारी ली थी। वह चंद्र सिंह राही के साथ कुछ संगीत संयोजन करना चाहते थे, लेकिन कल्याणजी के निधन के कारण संगीत की दुनिया इससे वंचित रह गई।
उत्तराखंड में आज लोकभाषा को बचाने का जनजागरण हो रहा है। राही शुरू से ही इस दिशा में अग्रसर थे। आज जब लोगों से गांव की ओर लौटो का आह्वानकिया जा रहा है, तब यही लगता है चंद्र सिंह राही के गीत किसी वापस लौटते
राही की प्रतिक्षा में हैं। समय बदला है पर चंद्र सिंह राही के गीतों में वही खुशबू है, वही माटी की सुगंध है। ऐसे लगता है कि जैसे उनकी आवाज फिर पुकार रही हो, भाना ये रंगीली भाना।