पिछले वर्ष सितंबर में मुजफ्फरनगर और उसके आसपास हुए सांप्रदायिक दंगों को नियंत्रित करने में उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार पूरी तरह नाकाम रही थी, जिसकी तस्दीक अब सर्वोच्च अदालत ने भी कर दी है। इस मामले में शुरू से प्रशासनिक तंत्र की भूमिका संदिग्ध रही, जिसकी वजह से वहां न केवल पचास से अधिक लोगों की मौत हो गई, बल्कि पचास हजार से अधिक लोगों को बेघर होना पड़ा।
हैरानी की बात है कि समाजवादी पार्टी की सरकार सांप्रदायिक सौहार्द की बात तो करती है, मगर उसने समय रहते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिगड़ते माहौल को नियंत्रित करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए। सर्वोच्च अदालत ने प्रथम दृष्टया इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार माना है और कहा है कि वह अपने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में नाकाम रही।
अलबत्ता युवा मुख्यमंत्री अखिलेश के लिए संतोष की बात यह हो सकती है कि अदालत ने दंगों की जांच के लिए उनकी सरकार की पहल को पर्याप्त माना है और सीबीआई जांच या एसआईटी के गठन से इन्कार किया है। दरअसल जिला प्रशासन ने राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारियों को या तो किसी दबाव में या फिर लापरवाही के कारण तवज्जो नहीं दी। वरना उपद्रवियों को रोका जा सकता था।
मगर हद तो तब हो गई, जब दंगों के बाद ठिठुरती ठंड में शिविरों में रह रहे लोगों के प्रति कुछ जनप्रतिनिधियों और कुछ अधिकारियों तक ने संवेदनहीनता बरती और उन्हें 'पेशेवर भिखारी' कहने तक से गुरेज नहीं किया! भूलना नहीं चाहिए कि सर्वोच्च अदालत शिविरों की बदहाली और वहां हुई कुछ बच्चों की मौतों के लिए पहले ही फटकार लगा चुकी है।
चूंकि अदालत का आदेश ऐसे समय आया है, जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दस लोकसभा सीटों पर 10 अप्रैल को मतदान होना है, इसलिए सबसे पहले जरूरी है कि मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों का राजनीतिकरण न हो। शीर्ष अदालत के इस आदेश को सबक की तरह लिया जाना चाहिए, ताकि फिर कोई अप्रिय घटना न हो। सूबे में सत्तारूढ़ सपा ही नहीं, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों की साझा जिम्मेदारी है कि गन्ने की मिठास वाले इस इलाके में अब किसी तरह की कड़वाहट न आने दें।