रूसी शहर उफा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच हुई वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों ने सीमा पर शांति और स्थिरता कायम करने की प्रतिबद्धता जताई थी, लेकिन एक हफ्ते के भीतर ही सीमा पार से जिस तरह की भड़काने वाली कार्रवाई की जा रही है, उससे पड़ोसी मुल्क की नीयत पर शक होना स्वाभाविक है।
बीते 48 घंटे के भीतर ही पाकिस्तान ने करीब आधा दर्जन बार संघर्ष विराम का उल्लंघन तो किया ही है, 'जासूसी ड्रोन' विवाद पैदा कर उसने बचकानी हरकत भी की है, जिसमें वह खुद ही उलझ गया है। जिस ड्रोन को गिराने का दावा पाकिस्तानी सेना कर रही है, उसका भारतीय सेना से तो लेना-देना नहीं ही है, बल्कि इसके डिजाइन से पता चला है कि यह चीन में निर्मित है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कश्मीर यात्रा से ऐन पहले की जा रही गोलाबारी और फिजूल की ये बयानबाजी यही बताती है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। भारतीय विदेश सचिव ने ठीक ही चेतावनी दी है कि ऐसी भड़काने वाली कार्रवाई का पुरजोर तरीके से जवाब दिया जाएगा। पाकिस्तान की हरकत यह भी बताती है कि वह जम्मू-कश्मीर में मजबूत होती जा रही लोकतांत्रिक प्रक्रिया से भी बौखलाया हुआ है, इसलिए गाहे-बगाहे वह कश्मीर को विवादास्पद मुद्दा बताने की कोशिश करता है।
इस घटनाक्रम के बाद लाख टके का सवाल है कि उफा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच जो सहमति बनी है, उसका क्या होगा? यदि मोदी और शरीफ के संयुक्त बयान पर गौर करें, तो उसमें सबसे अहम बिंदु शांति और स्थिरता से ही जुड़ा है, पर जब तक आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान अपना रुख नहीं बदलता, इसकी कल्पना बेमानी है। मुंबई बमकांड के सिलसिले में भारत में वांछित जकीउर रहमान लखवी के मामले में उसका दोहरा रुख पहले ही सामने आ चुका है।
सच तो यह है कि जिस तरह से पाकिस्तान संघर्ष विराम समझौते का उल्लंघन कर रहा है, उससे दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुलाकात भी अनिश्चित दिख रही है। उफा में बनी सहमति को आगे ले जाने की जिम्मेदारी बेशक दोनों देशों की है, लेकिन अतीत के अनुभव बताते हैं कि पाकिस्तान अपने किए वायदों से मुकर जाता है।