मौसम विभाग ने जब इस बार मानसून सामान्य से कम रहने का अंदेशा जताया था, तब खेती के प्रभावित होने की आशंका डराने लगी थी, लेकिन अब जब पिछले कुछ दिनों से मूसलाधार बारिश हो रही है, तब उत्तर भारत के शहरी इलाकों में त्राहि-त्राहि मची हुई है।
दिल्ली में जुलाई की वर्षा ने पिछले कई वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी औसत से ज्यादा बारिश हुई है। यह वर्षा दलहन, तिलहन और कपास की फसलों के लिए फायदेमंद है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन किसानों के चेहरों पर उभरी खुशियों की तुलना में शहरों में त्रासदी और अव्यवस्था के ब्योरे ही फिलहाल ज्यादा हैं। मसलन, सड़कों पर जलभराव और पेड़ों के गिरने से जहां दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गाड़ियों की रफ्तार थम गई है, वहीं घरों में पानी घुसने और सड़कों पर उफनते कूड़े के कारण जगह-जगह लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। अलीगढ़ में जर्जर मकान गिरने से कुछ मौतें हुई हैं, तो इलाहाबाद समेत कई जगहों में बारिश से बिजली गुल हो गई है।
मैदानों में यह हालत है, तो पहाड़ों की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं। उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के लिए निकले तीर्थयात्री जगह-जगह फंस गए हैं, हरिद्वार में गंगा का जलस्तर बढ़ने के कारण लोगों को सावधान किया गया है, तो ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग जगह-जगह बाधित हो गया है। इसी तरह भूस्खलन से हिमाचल प्रदेश में अनेक सड़कें बंद हो गई हैं, जिस कारण आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है।
बेशक प्रकृति पर किसी का जोर नहीं। फिर मानसून की वर्षा न हो, तो खेती तो चौपट ही हो जाएगी। जलवायु परिवर्तन के कारण अब वर्षा वैसे भी ज्यादा लंबे समय तक नहीं होती। लेकिन दो-तीन दिन भी अगर मूसलाधार वर्षा हो, तो शहरी विकास व्यवस्था की पोल खुल जाती है।
मूसलाधार बारिश में आज हम जिन मुसीबतों से दो-चार होते हैं, उनके लिए कमोबेश खुद हम जिम्मेदार हैं। उदाहरण के लिए, शहरों में पानी की निकासी की व्यवस्था पर तो कम ध्यान दिया जाता ही है, तालाबों और कुओं को पाटकर मकान बनाए जाने और वर्षा जल के जमीन के अंदर न जाने के कारण भी थोड़ी देर की बारिश से जलभराव की स्थिति बन जाती है। बारिश में शहरों का यह हाल देखकर हमें स्मार्ट सिटी परियोजना पर गंभीरता से काम करना होगा।