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संसद में बढ़ती दूरियां

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संसद में विधायी कामकाज का ठप होना नया नहीं है और न ही सदनों में समय बर्बाद होने की सच्चाई अब किसी को चिंतित करती है।
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लेकिन संसदीय कामकाज के प्रति विपक्ष और सत्ता पक्ष की समान उदासीनता का नजारा इस बजट सत्र में जिस तरह दिखा, उसके उदाहरण कम ही मिलेंगे।

जब एक ने करीब पूरे सत्र में कामकाज नहीं होने दिया, तो दूसरे ने सीबीआई मामले में सर्वोच्च न्यायालय की दोबारा फटकार के बाद विपक्ष की आलोचना से बचने के लिए दो दिन पहले अचानक सत्रावसान का दांव खेल दिया!

सिर्फ यही नहीं कि इस बार बजट सत्र में कोई विधेयक पारित नहीं हुआ; रेल और आम बजट भी बिना बहस के पारित हुए, समय की बर्बादी के लिहाज से भी इसे अब तक का सबसे निराशाजनक बजट सत्र बताया जा रहा है।
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2 जी घोटाले पर जेपीसी की रिपोर्ट लीक होने, कोयला घोटाले में सीबीआई की रिपोर्ट बदलवाने और रेल मंत्री के भांजे की गिरफ्तारी को देखते हुए बजट सत्र के खासकर दूसरे चरण में हंगामा मचना स्वाभाविक था। और सत्ता से जुड़े भ्रष्टाचारियों के इस्तीफे की विपक्ष की मांग को नाजायज भी नहीं कह सकते।

वह संसद में आवाज नहीं उठाएगा, तो कहां उठाएगा? लेकिन इस पूरे प्रकरण में लगातार निशाने पर आने के बावजूद सरकार में जहां भ्रष्टों को बाहर करने की नैतिकता नहीं जगी, वहीं विपक्ष ने संसद का कामकाज बाधित करने को ही अपना लक्ष्य बना लिया।
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बेशक भ्रष्टाचारियों को बचाने वाली सरकार को सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है, पर सरकार के खिलाफ जंग में बार-बार उस जनता के हक की बलि क्यों चढ़ती है, जो इन प्रतिनिधियों को बहुत उम्मीद के साथ संसद में भेजती है? आखिर संसद के बाहर भी सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है।

इसके बजाय सदनों को ही अखाड़ा बना दिया जाता है। इसी गतिरोध का नतीजा है कि इस बार भी खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण जैसे कई महत्वपूर्ण विधेयक लटक गए।

दरअसल सत्ता और विपक्ष, दोनों तरफ अब ऐसे व्यक्तित्व कम रह गए हैं, जो आपसी सहमति और तालमेल से सदनों को चलने देने की व्यवस्था बनाने का नैतिक बल रख सकें।

पर इसका मतलब यह नहीं कि संसद को अपने निहित सियासी इरादों का बंधक बनाकर रखा जाए।
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