लगातार घाटे और कर्ज में डूबी निजी विमानन कंपनी किंगफिशर आज जिस संकट से गुजर रही है, वह दरअसल व्यापक रूप से देश के विमानन क्षेत्र का संकट भी है। इससे देश की विमानन नीति की खामियां ही नहीं, उस अर्थनीति के अंतर्विरोध भी उजागर हुए हैं, जिसके कारण एक समय सस्ती विमान सेवा के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह निजी विमानन कंपनियां उग आई थीं। ऐसी कंपनियों को टिकना था नहीं, सो या तो वे डूब गईं या उनका अधिग्रहण कर लिया गया।
आज हालत यह हो गई है कि किंगफिशर जैसी दिग्गज कंपनी तक अपने पायलटों और अन्य कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं दे पा रही है। बेशक, किंगफिशर के इंजीनियर मानस चक्रवर्ती की पत्नी ने जिस तंगहाली में खुदकुशी की है, उसे अपवाद माना जा सकता है। मगर यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अभी तक ऐसी खबरें कर्ज में डूबे किसानों या दो वक्त की रोटी का जुगाड़ न कर सकने वाले मजदूरों के घरों से ही आती रही हैं! किंगफिशर के संकट के लिए निश्चित रूप से इसके मालिक विजय माल्या के कुप्रबंधन को जिम्मेदार माना जा सकता है।
आखिर ऐसा कैसे हो गया कि उनकी दूसरी कंपनियां और धंधे तो मुनाफे में हों, खुद वह देश के सबसे अमीरों की सूची में शुमार हों और उनकी विमानन कंपनी दिवालिया होने के कगार पर आ जाए! नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह आज जिस सख्ती की बात कर रहे हैं, वह तो तभी की जानी चाहिए थी, जब साल भर पहले माल्या ने हाथ खड़े कर दिए थे।
घाटे में चलने वाली किंगफिशर अकेली विमानन कंपनी नहीं है, एयर इंडिया सहित तमाम दूसरी कंपनियां अपना खर्चा नहीं निकाल पा रही हैं। इस बदहाली के लिए सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है, वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि विमान यात्रियों की संख्या तो लगातार बढ़ती जाए और विमान कंपनियां घाटे में डूबती जाएं। असल में भारत में विमान सेवाओं के परिचालन खर्च का चालीस फीसदी हिस्सा ईंधन पर चला जाता है और यह वैश्विक मानक से काफी अधिक है। सरकार कोई ऐसा रास्ता नहीं निकाल सकी है, जिससे इस अंतर को कम किया जाए। अब विमानन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी गई है, पर जब तक नियामक तंत्र को मजबूत नहीं किया जाएगा, ऐसे उपाय कारगर साबित नहीं होंगे।