तकरीबन एक वर्ष से स्थिर सरकार की प्रतीक्षा कर रहे दिल्ली के लोगों को यह देखकर हैरानी नहीं हुई होगी कि विधानसभा चुनाव में उतरीं तीनों प्रमुख पार्टियों भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने बिजली, पानी, महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और झुग्गियों के नियमित करने के मामले में तकरीबन मिलते-जुलते वायदे किए हैं।
मसलन, आम आदमी पार्टी ने जहां ऑडिट होने तक बिजली की दरें आधी करने का आश्वासन दिया है, तो भाजपा ने बिजली की दरों में महत्वपूर्ण कटौती का वायदा किया है। वहीं कांग्रेस भाजपा से एक कदम आगे बढ़कर डेढ़ रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली देने की बात कर रही है। यही नहीं, तीनों दलों ने सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए सीसीटीवी लगाने की बात की है।
निश्चय ही केंद्र में सरकार होने का भाजपा लाभ लेना चाहेगी और उसकी ओर से लगातार यह प्रचारित भी किया जा रहा है कि चूंकि हरियाणा में भी भाजपा की सरकार है, इसलिए दिल्ली को पानी मिलने में दिक्कत नहीं होगी। मगर सवाल है कि क्या दिल्ली में किसी और दल की सरकार बन जाएगी, तो क्या यहां के लोगों को पानी नहीं मिलेगा? वास्तव में दिल्ली की समस्या इसकी बढ़ती आबादी है, जिसके अनुरूप मास्टर प्लान को बदलने की जरूरत है, मगर चार बार समय सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद दिल्ली के मास्टर प्लान-2021 को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। हालत यह हो गई है कि दिल्ली से सटे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गाजियाबाद, फरीदाबाद, नोएडा और गुड़गांव तक मिलकर इसका बोझ नहीं उठा पा रहे हैं। मगर मुश्किल यह है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है, लिहाजा मास्टर प्लान में राज्य सरकार की सीधी कोई भागीदारी नहीं होती।
विधानसभा चुनाव में सीधे यह कोई मुद्दा भले न हो, लेकिन दिल्ली पर दावेदारी कर रहे तीनों प्रमुख दलों के पास इस शहर के बढ़ते बोझ से निपटने को लेकर कोई वृहत दृष्टि नजर नहीं आती। हैरानी नहीं होनी चाहिए कि जो भाजपा साल भर पहले तक दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की मांग के साथ थी, उसने इससे अब कदम पीछे खींच लिए हैं। इससे दिल्ली पुलिस के नियंत्रण का सवाल भी अटक गया है। लेकिन सबसे दुखद यह है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के बीच जारी तीखी तकरार में दिल्ली के भविष्य को लेकर इस चुनाव में कहीं कोई स्वस्थ बहस देखने को नहीं मिल रही है।