नए साल का सूरज सिर्फ सूरज नहीं होता, वह हमारी उम्मीदों की गुनगुनी धूप भी होता है, ताकि अनिश्चय के कोहरे से पार पाया जा सके। नया वर्ष केवल पुराने कैलेंडर का खत्म हो जाना भर नहीं होता, बल्कि नई ऊर्जा और नई संकल्पना का अवसर भी होता है, ताकि पुरानी चुनौतियों को खत्म कर विकास की नई परिभाषा गढ़ी जा सके।
नए साल की नई सुबह की तरह केंद्र में भी बहुमत के साथ एक नई सरकार है, जिसने गरीबों को बैंकों में प्रवेश दिलाने के साथ स्वच्छता और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की बहाली के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है। पिछले वर्ष मंगलयान और नोबल जैसी उपलब्धियों ने भारत को गौरवान्वित किया, तो आगामी गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का मुख्य अतिथि होना अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की मजबूती का एक और उल्लेखनीय प्रमाण होगा। मगर इस नए साल में अपेक्षाओं की तुलना में परीक्षाएं ही ज्यादा दिखती हैं।
मसलन, विकास के वायदों के साथ आई सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2000 में हमने जो सहस्राब्दी विकास लक्ष्य तय किए थे, 2015 उसका आखिरी वर्ष है, और गरीबी, प्राथमिक शिक्षा, लैंगिक समानता, बाल मृत्यु दर, जननी सुरक्षा, एचआईवी/एड्स और दूसरी बीमारियों पर नियंत्रण, पर्यावरण विकास और वैश्विक साझेदारी के कुल आठ लक्ष्यों में से एक भी अब तक पूरा नहीं हो पाया है।
मानो यही काफी न हो, आदिवासी समाज हाशिये पर है, औरतें महानगरों में भी सुरक्षित नहीं हैं, और सांप्रदायिक असहिष्णुता के सुबूत धर्मांतरण से लेकर फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की मांग तक में देखे जा सकते हैं। वह राजनीतिक असहमति भी कम चिंताजनक नहीं है, जिस कारण कानून संसद में बहस के बाद नहीं, बल्कि अध्यादेशों के जरिये सामने आ रहे हैं। क्या नए वर्ष में हम इनमें बदलाव देखेंगे?
पांच फीसदी से कम की विकास दर पर सिमट चुकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और देश में कारोबार का माहौल सुधारने की कसौटी पर भी सरकार को इस साल खरा उतरना होगा। नौकरशाही की कार्यसंस्कृति में कमोबेश बदलाव भले आया हो, पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए बिना असल परिवर्तन संभव नहीं है। यूपीए सरकार के दस साल को विफल दशक कहा जाता है, तो उसकी वजहें हैं। पर सवाल यह है कि क्या 2015 उस विफलता का प्रस्थान बिंदु साबित होगा।
नया वर्ष केवल पुराने कैलेंडर का खत्म हो जाना भर नहीं होता, बल्कि नई ऊर्जा और नई संकल्पना का अवसर भी होता है, ताकि पुरानी चुनौतियों को खत्म कर विकास की नई परिभाषा गढ़ी जा सके।