केंद्रीय मंत्रालय से संवेदनशील जानकारियों की चोरी के तंत्र में लिप्त कुछ लोगों की गिरफ्तारी जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही स्तब्ध करने वाली यह सूचना है कि उनके पास वित्त मंत्री के आगामी बजट भाषण में शामिल होने वाले कुछ मुद्दों से जुड़े इनपुट तक थे। मंत्रालय से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गोपनीय दस्तावेज भी लीक हुए बताए जाते हैं!
गोपनीय सरकारी दस्तावेजों की चोरी और जासूसी नई बात बेशक न हो, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनेट मंत्री, सचिव और संयुक्त सचिवों के बीच होने वाले पत्राचार की जेरॉक्स कॉपियां मंत्रालय के छोटे कर्मचारियों के जरिये कंसल्टेंसी कंपनियों, और वहां से बड़ी कंपनियों के अधिकारियों तक निरंतर पहुंचने की कल्पना भी हैरान कर देने वाली है।
हालांकि अभी बहुत कुछ साफ होना बाकी है, पर जितने ब्योरे सामने आए हैं, उनके आधार पर यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि चपरासी स्तर के कर्मचारी मंत्रालय का कामकाज खत्म होने के बाद बाहरी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर अंदर जाते होंगे, सीसीटीवी को कुछ समय के लिए ऑफ कर बड़े अधिकारियों के केबिन से संवेदनशील कागजात निकालकर, उनकी फोटोकॉपी कर बाहर ले जाने में सफल हो जाते होंगे। कई कंपनियों के बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारी को देखते हुए भी यह मानना कठिन है कि मंत्रालय के भीतर फाइलों की चोरी का काम कुछ छोटे कर्मचारी ही अंजाम दे रहे होंगे।
जिस दौर में सरकार पर कॉरपोरेट हितों के अनुरूप फैसले लेने के आरोप लगते हैं, जिस दौर में बड़े सरकारी अधिकारियों के रिटायरमेंट से पहले या बाद में कॉरपोरेट कंपनियों से जुड़ने के उदाहरण निरंतर बढ़ते जा रहे हैं, उस दौर में मंत्रालय के भीतर जासूसी के जाल पर से उठा यह पर्दा सबसे ज्यादा उस बढ़ते लालच का ही सुबूत है, जिसके लिए ईमानदारी का कोई मतलब नहीं है।
लेकिन सवाल यह भी है कि संवेदनशील दस्तावेजों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए क्या तय नियमों का पालन किया जा रहा था। नौकरशाही और कॉरपोरेट की बढ़ती नजदीकी को देखते हुए इस दिशा में तो बहुत पहले ही ध्यान देना चाहिए था। सरकार से यह अपेक्षा तो है ही कि वह जासूसी में लिप्त बड़ी से बड़ी मछलियों को नहीं छोड़ेगी, सरकारी दस्तावेजों की अचूक सुरक्षा के लिए भी उसे अब कमर कस लेनी चाहिए।