महज कुछ दिनों की मूसलाधार बारिश से आई भीषण बाढ़ ने धरती के स्वर्ग की तस्वीर ऐसी बदरंग कर दी है कि वह पहचान में ही नहीं आती। जिसके सौंदर्य से खिंचकर सैलानी सालों भर पहुंचते थे, वहां अब दूर-दूर तक पानी ही पानी और जान बचाने की होड़ है। जम्मू-कश्मीर में बाढ़ ने सैकड़ों लोगों की जान ली है, हजारों लोग विस्थापित हैं, असंख्य गांव लुप्त हो चुके हैं और पिछले कई दिनों से बिजली-पानी व संचार सेवा ठप है।
तवी नदी में आए उफान ने जम्मू में भारी तबाही मचाई, तो झेलम का कश्मीर में तांडव जारी है। दक्षिण कश्मीर के कई जिले पहले ही जलमग्न हो गए थे कि झेलम के रौद्र रूप ने श्रीनगर शहर को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया है। आलम यह है कि उच्च न्यायालय परिसर और सैनिक छावनी तक में पानी घुस गया है। इस बीच कई इलाकों में भूस्खलन भी हुआ है।
प्रकृति का प्रकोप चूंकि मानव निर्मित सीमाओं पर नहीं रुकता, इसलिए सरहद के उस पार भी बर्बादी के ऐसे ही भीषण दृश्य हैं। बल्कि पाक अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान में स्थिति ज्यादा गंभीर बताई जा रही है। यह जरूर थोड़ा आश्वस्त करने वाला है कि जम्मू-कश्मीर के हालात का केंद्र सरकार न सिर्फ तत्काल संज्ञान लिया, बल्कि गृह मंत्री के दौरे के अगले ही दिन आए प्रधानमंत्री मोदी ने इसे राष्ट्रीय स्तर की त्रासदी बताते हुए अतिरिक्त आर्थिक मदद की तुरंत घोषणा की। नरेंद्र मोदी ने आपदा की इस घड़ी में पाकिस्तान की मदद की इच्छा जताकर मानवीयता का ही परिचय दिया, लेकिन इस पर इस्लामाबाद ने जिस किस्म की प्रतिक्रिया दी है, उससे पता चलता है कि विपत्ति के इस मौके पर भी वह भारत-विरोधी अपनी मानसिकता का परित्याग नहीं कर सकता।
बाढ़ग्रस्त जम्मू-कश्मीर में व्यापक पैमाने पर राहत और पुनर्वास का काम शुरू तो हो गया है, लेकिन नवनिर्माण की असली चुनौती तो पानी उतरने के बाद शुरू होगी, जब बीमारियों-महामारियों की आशंकाओं को निर्मूल करने के साथ बाढ़ प्रभावितों के पुनर्वास की व्यवस्था करनी पड़ेगी। बाढ़ ने गांवों, फसलों और शहरी आबादी को जिस तरह अपनी चपेट में लिया है, आर्थिक गतिविधियों को जैसा नुकसान पहुंचा है, जिस संख्या में सड़क और पुल बह गए हैं, तमाम संसाधनों को जिस तरह नुकसान पहुंचा है, उसे देखते हुए जम्मू-कश्मीर को दोबारा अपने पैर पर खड़े होने के लिए समय लगेगा।