प्रख्यात शिक्षाविद तथा स्वतंत्रता सेनानी महामना मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को देश के सर्वोच्च नागरिक अलंकरण से सम्मानित करने का फैसला विलंबित होने के बावजूद प्रशंसनीय है, बल्कि इनके जन्मदिन पर इन्हें सम्मानित करने के निर्णय का तो प्रतीकात्मक महत्व भी है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकाधिक बार अध्यक्ष रह चुके मदन मोहन मालवीय ने स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी भूमिका निभाई और महात्मा गांधी के नजदीकी रहे, तो शिक्षाविद के तौर पर उन्होंने देश को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसी एक विराट शिक्षा संस्था दी। वह हिंदू महासभा से भी जुड़े रहे, लेकिन उनके हिंदू राष्ट्रवाद में सभी धर्मों और संप्रदायों के लिए समान जगह थी। इसके बावजूद उन्हें शीर्ष नागरिक सम्मान देने में इतने वर्ष लग गए, यह अपने आप में चकित करने वाला है, पर भारत रत्न की सूची में ऐसे कई विलंबित फैसले और हैं, इसलिए वर्षों बाद महामना का चयन उतना चकित नहीं करता।
दूसरी ओर, अटल बिहारी वाजपेयी केंद्र में गैरकांग्रेसवाद के सबसे विराट, सबसे स्वीकार्य और सबसे सम्मानित व्यक्तित्व रहे हैं। आर्थिक मजबूती के लिए उठाए गए कदम, पोकरण-2 और लाहौर बस यात्रा प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी मौलिक सोच और लीक से हटकर चलने का सुबूत रही, तो वैचारिक उदारता उनके व्यक्तित्व की ऐसी पूंजी है, जो संकीर्ण राजनीति के इस दौर में विरल है। लंबे संसदीय जीवन में वाजपेयी ने अनेक बार सदन में अपनी विलक्षण वक्तृत्व कला से सांसदों का दिल जीता, विनोदी छवि से तनावपूर्ण माहौल बदला और उदार मानसिकता के जरिये भारतीय संस्कृति में व्याप्त सर्वधर्मसमभाव का एहसास कराया। बीमारी के कारण वाजपेयी पिछले कुछ वर्षों से समकालीन राजनीति के नेपथ्य में जरूर चले गए हैं, लेकिन तनिक भी अप्रासंगिक नहीं हुए हैं।
उन्हें भारत रत्न देने का फैसला कर पिछली यूपीए सरकार उदार सोच का परिचय दे सकती थी। अलबत्ता देर से ही सही, वाजपेयी को शीर्ष नागरिक सम्मान देने का यह फैसला आश्वस्त करता है कि इस दौर में भी मूल्यों की राजनीति के लिए जगह बची हुई है। सरकार ने भारत रत्न के लिए इन दो व्यक्तित्वों को चुनकर सराहनीय फैसला तो किया ही है, उम्मीद करनी चाहिए कि वह कामकाज में भी इनके आदर्शों का अनुकरण करेगी।