लगातार आत्मकेंद्रित होते जाते हमारे जीवन में होली जैसे त्योहार की सार्थकता इसमें है कि वह व्यस्तता, विषाद और तनाव के बीच हंसी-खुशी और उल्लास के कुछ पल ले आता है। होली सिर्फ ठेठ ग्रामीण अंचलों में गाढ़े रंगों से चेहरों को लेप दिए जाने का पर्व नहीं है, यह महानगर के आधुनिक युवाओं में अबीर-गुलाल के बीच मुस्कराते चेहरों का उत्सव भी है।
कभी होली को अपना सांस्कृतिक हिस्सा बताते हुए कुछ शहरी लोगों को भले हिचक होती रही हो, लेकिन आज ब्रज की लट्ठमार होली विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन चुकी है! रंगों के बहाने यह सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने का अवसर है; वृंदावन की विधवाओं ने इस साल रंगों की होली खेलकर इसे साबित भी किया है। पिछले अनेक वर्षों से देश भर में स्कूली बच्चों को प्राकृतिक रंगों से होली खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि रासायनिक रंगों से होने वाली क्षति कम हो। ऐसे अवसर पर नशाखोरी और अशालीन आचरण के खिलाफ भी जगह-जगह सामाजिक अभियान चलाए जाने लगे हैं। जाहिर है, होली से जुड़ी अनेक चीजें समय के अनुरूप बदल रही हैं।
पर होली के त्योहार को प्रकृति से जोड़ने की दिशा में संतोषजनक काम अब भी नहीं हुआ है। हमारे सारे त्योहार कभी प्रकृति के बीच मनाए जाते थे, लेकिन अब प्रकृति से जुड़ा सिर्फ यही एक उत्सव रह गया है। कभी तरह-तरह के फूलों को पीसकर होली के रंग तैयार किए जाते थे। होलिका दहन का अनुष्ठान तो अब भी प्रकृति के बगैर संभव नहीं है। लेकिन इस अवसर पर जिस निर्दयता से हम पेड़ों की टहनियां काटते हैं, उसी आत्मीयता से क्या वृक्षारोपण भी करते हैं? कविगुरु रवींद्रनाथ ने होली को वसंत उत्सव के रूप में मनाने की अनूठी शुरुआत की थी, लेकिन इस अवसर पर पलाश के फूल के लिए पेड़ों और टहनियों को काटने की बढ़ती व्यावसायिक होड़ से खीझकर शांतिनिकेतन प्रशासन को अब परिसर में पलाश के फूल तोड़ने पर ही पाबंदी लगा देनी पड़ी है!
दरअसल हम प्रकृति का केवल दोहन करने में ही यकीन करते हैं, उसका संरक्षण करने में नहीं। होली जिस तरह हमारे जीवन में रंग भरती है, उसी तरह हमें भी प्रकृति को उसका हरापन लौटाना चाहिए। तभी खुद हमारे जीवन में भी रंग बचे रहेंगे।