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इन कंधों पर है देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था

Sun, 16 Mar 2014 02:04 PM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
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बतौर प्रमुख सचिव शासन में बैठकर जनहित के मुद्दों पर फैसले लेकर नीति क्रियान्वित करना और मुख्य निर्वाचन अधिकारी की भूमिका में सरकार पर ही अंकुश लगाना आसान काम नहीं है।
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बेहतर समन्वय का यह हुनर कोलकाता से स्कूलिंग व मुंबई से उच्च शिक्षा पाने वाली 1988 बैच की आईएएस अफसर राधा रतूड़ी को बखूबी आता है।

चुनाव कराते समय जब भी कार्रवाई की तब उन्होंने यह कतई नहीं सोचा कि चुनाव जीतकर आने वाला राजनीतिक दल अपनी सरकार उन्हें कौन सा विभाग देगा।

कई उप-चुनावों के साथ ही रतूड़ी ने 2009 का लोकसभा, 2012 का विधानसभा चुनाव सम्पन्न कराए और अब 2014 का लोकसभा चुनाव कराने की तैयारी है। पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश:-

प्र. मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रूप में सात साल से लगातार काम करते रहने के बाद सबसे बेहतरीन तजुर्बा क्या रहा ?
उ. आईएएस बनते हैं तो संविधान के प्रति जिन दायित्वों को निर्वाह करने का प्रण लिया जाता है, उन्हें पूरा करने का सर्वाधिक अहसास इस पोस्ट पर काम करने के बाद ही होता है। पूरी तरह निष्पक्ष और बगैर किसी दबाव के काम करने का मौका मिलता है। और सबसे संतोषजनक बात यह है कि यह कार्य देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए है।
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प्र. चुनाव प्रक्रिया के दौरान कई बार ऐसे राजनीतिक दलों के खिलाफ ही कार्रवाई हो जाती है जो चुनाव बाद जीतकर सत्तारूढ़ होते है, उनसे फिर कैसे तालमेल बैठता है ?
उ. मुझे लगता है कि राजनीतिक दल भी चुनाव के दौरान की गई कार्रवाई को सत्ता में आने के बाद भेदभाव से नहीं देखते। क्योंकि चुनाव के दौरान कार्रवाई की एक प्रक्रिया होती है, सब कुछ कानूनी रूप से होता है। इसलिए मुझे ऐसी किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।

प्र. चुनाव और शासन के जॉब वर्क में क्या फर्क महसूस करती है ?
उ. अच्छा हो या बुरा लेकिन इलेक्शन जॉब का नतीजा तत्काल सामने आता है। जो भी करना है आज अभी करना है। लेकिन शासन के काम दीर्घकालीन होते है, आज कोई पॉलिसी फ्रेम करो उसका प्रभाव काफी बाद देखने को मिलता है।

प्र. अभी आने वाले चुनाव में संवेदनशीलता के लिहाज से कहां कहां ज्यादा फोकस रहेगा ?
उ. चकराता में डबल वोटिंग की शिकायतें मिलती रही हैं। वोटरों को कई बार मताधिकार के प्रयोग से रोकने का भी प्रयास हुआ। हरिद्वार व ऊधमसिंहनगर यूपी का बॉर्डर होने से संवेदनशील है। इस बार तो मुजफ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगो की वजह से ज्यादा चौकसी होगी।
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