महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनावों से ऐन पहले विभिन्न राज्यों की 33 विधानसभा सीटों पर हुए उप चुनावों के नतीजे भाजपा के लिए कड़ा संदेश लेकर आए हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि महज सवा सौ दिन पहले लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा के कब्जे से सीटें खिसकती जा रही हैं? इससे पहले उत्तराखंड की तीन सीटों और उसके बाद पिछले महीने बिहार सहित कई राज्यों की 18 विधानसभा सीटों पर हुए उप चुनावों में भी भाजपा को ऐसी ही पराजय देखनी पड़ी थी। तो क्या 'मोदी लहर' फीकी पड़ गई है?
बेशक इन नतीजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता या उनकी सरकार के कामकाज से सीधे जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उप चुनावों में स्थानीय कारक भी अहम होते हैं। मगर ये नतीजे बताते हैं कि 'सबका साथ सबका विकास' और 'अच्छे दिन' आने के वायदे के साथ यदि किसी भी तरह का घालमेल किया जाएगा, तो लोग उसे नकार देंगे। खासतौर से उत्तर प्रदेश के नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं कि लोगों ने कथित 'लव जेहाद' के नाम पर की जा रही उस संकीर्ण और विभाजनकारी राजनीति को नकारा है, जिसे बहुत सुनियोजित तरीके से उभारने की कोशिश की जा रही थी।
स्वाभाविक रूप से समाजवादी पार्टी उत्साहित होगी, क्योंकि उसने न केवल भाजपा से आठ विधानसभा सीटें हथियाई हैं, बल्कि मैनपुरी की लोकसभा सीट पर भी पहले से अधिक अंतर से अपना कब्जा बरकरार रखा है। अब संभव है कि लालू और नीतीश के साथ मिलकर मुलायम सिंह यादव केंद्रीय राजनीति में अपने लिए नए सिरे से भूमिका तलाश करें। वहीं भाजपा के लिए चिंता की बात यह भी होनी चाहिए कि उसने राजस्थान और मोदी के गृह प्रदेश गुजरात में भी अपनी सीटें खोई हैं।
दूसरी ओर लोकसभा चुनावों के बाद से पस्त और आपसी झगड़े में उलझी कांग्रेस ने इन राज्यों में वापसी की है। भाजपा के लिए यह जरूर संतोष की बात हो सकती है कि उसे पंद्रह वर्ष बाद पश्चिम बंगाल में किसी विधानसभा सीट पर जीत मिली है, और मोदी के कारण रिक्त हुई वडोदरा लोकसभा और मणिनगर विधानसभा सीट पर भी उसने कब्जा बरकरार रखा है। लेकिन इन नतीजों का सबसे बड़ा सबक भाजपा के लिए ही है कि मुखौटों की राजनीति कर लोगों का भरोसा नहीं जीता जा सकता।