महाराष्ट्र में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने जा रही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी के युवा प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फड़नवीस पर भरोसा जताया है, जिनका मुख्यमंत्री बनना अब सिर्फ औपचारिकता रह गई है। यों 1995 से 1999 के दौरान भाजपा ने शिवसेना के साथ गठबंधन सरकार बनाई थी, लेकिन गठबंधन और सरकार में उसकी भूमिका 'छोटे भाई' जैसी ही रही।
नरेंद्र मोदी की अगुआई में केंद्र में सरकार बनाने के बाद से भाजपा की नजर जिन राज्यों में थी, उसमें महाराष्ट्र भी शामिल था। शिवसेना की मांगों को ठुकराते हुए उसने चुनाव में अकेले जाने का फैसला किया और उसका यह दांव सही साबित हुआ। बेशक भाजपा को मोदी की लोकप्रियता और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीतियों का फायदा मिला, पर यह भी सच है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रहते फड़नवीस ने पार्टी को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
यही नहीं, विधानसभा में भी आदर्श घोटाले और सिंचाई घोटाले के मुद्दे पर उन्होंने लगातार कांग्रेस एनसीपी सरकार पर तीखे हमले किए थे। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नितिन गडकरी जैसे दिग्गज को पीछे छोड़ने वाले फड़नवीस को मोदी और शाह के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी समर्थन प्राप्त है। और वह उस विदर्भ से आते हैं, जिसने भाजपा को क्षेत्र की 62 में से 44 सीटें दी हैं।
जाहिर है, उनके मुख्यमंत्री बनने से भले ही अलग विदर्भ राज्य की मांग को थोड़ा विराम मिल जाए, मगर इस क्षेत्र के लोगों की उनसे अपेक्षाएं भी काफी होंगी। खासतौर से इसलिए भी, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में यह इलाका किसानों की आत्महत्या के कारण लगातार सुर्खियों में रहा है। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के रूप में गैर जाट मुख्यमंत्री देने के बाद भाजपा फड़नवीस के रूप में महाराष्ट्र को गैर मराठा मुख्यमंत्री देने जा रही है।
यह प्रदेश की राजनीति में एक तरह से मराठा वर्चस्व को चुनौती है। सबसे दिलचस्प स्थिति शिवसेना की हो गई है, जिसे मजबूरी में भाजपा को समर्थन देने के लिए सामने आना पड़ा है। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पहले ही भाजपा की तरफ सहयोग का हाथ बढ़ा दिया था, लिहाजा शिवसेना पर नई सरकार की निर्भरता वैसे भी कम हो गई है। अभी यह साफ नहीं है कि शिवसेना सरकार में शामिल होगी या नहीं, पर यह तय है कि नई सरकार उसके रिमोट से नहीं चलेगी।