सरकारें ज्वलंत मुद्दों के समाधान की कोशिशों को किस तरह लटकाती हैं, नक्सल समस्या इसका ताजा उदाहरण है। खुद प्रधानमंत्री कभी इसे सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं। देश के 180 जिलों में नक्सलियों की मजबूत पैठ का आंकड़ा अब भी बहुत पुराना नहीं हुआ है।
हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा और झारखंड में नक्सली हिंसा की बड़ी घटनाएं तो हुई ही हैं, इसी साल छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की रैली पर हमने भीषणतम नक्सली हमला देखा है। इसके बाद भी इससे निपटने के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं बन पाया है, तो इसे सरकारी इच्छाशक्ति का अभाव ही कहेंगे! सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका बताती है कि नक्सलवाद से निपटने की एक समग्र नीति पर सैद्धांतिक सहमति बन जाने के बावजूद यह कानून का रूप नहीं ले पाई है, तो इसका कारण दो केंद्रीय मंत्रालयों के बीच की मतभिन्नता है।
याचिका की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र और नक्सल प्रभावित राज्यों को नोटिस भेजकर ठीक किया है, लेकिन इसी आधार पर नक्सलवाद के खिलाफ तत्काल केंद्रीय कानून बन जाने की सोचना कुछ ज्यादा ही उम्मीद करना होगा। छत्तीसगढ़ की दरभा घाटी में नक्सली हमले के बाद यह अपेक्षा थी कि केंद्र अब इस संबंध में कानून बनाने में जरा भी देर नहीं करेगा। यह उम्मीद इसलिए भी थी कि उस हमले में कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मारे गए थे। पर कुछ हुआ नहीं।
नक्सलवाद से न निपट पाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस बारे में यूपीए और गैरकांग्रेसी राज्य सरकारों के बीच कभी नीतिगत एकरूपता नहीं रही। केंद्र सरकार के भीतर भी यह ऊहापोह रहा है कि बल प्रयोग कारगर है या विकास। विकास के पक्षधर मंत्री जयराम रमेश अब उम्मीद जता ही रहे हैं कि भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक से नक्सल समस्या पर अंकुश लगेगा। उनका तो यहां तक कहना है कि नक्सलवाद के पनपने के पीछे सरकारी कंपनियों द्वारा जमीन अधिग्रहण बड़ा कारण रहा है।
वह बेशक गलत नहीं कह रहे, पर यह कैसे भूल सकते हैं कि सरकारी कंपनियों को जमीन मुहैया कराने में खुद सरकारों की बड़ी भूमिका रही है। साफ है कि अंतर्विरोधों को दूर किए बिना नक्सल समस्या का समाधान मुमकिन नहीं।