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ममता की बढ़ती मुश्किलें

Fri, 16 Jan 2015 08:43 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की जिस तृणमूल सरकार को वाम मोर्चे की लंबी निरंकुशता से मुक्ति के रूप में देखा गया था, खुद वह अब एक के बाद एक मुश्किल में घिरती जा रही है, जिससे उसकी स्थिरता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
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राज्य के शरणार्थी राहत और पुनर्वास मंत्री मंजुलकृष्ण ठाकुर का इस्तीफा देकर भाजपा में चले जाना पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है। उनके इस्तीफे को ममता बनर्जी से उस मतुआ संप्रदाय के मोहंभग के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी राज्य में बड़ी आबादी है। तृणमूल की चुनौती यह भी है कि ठाकुर के लोकसभा क्षेत्र बनगांव में अगले महीने उपचुनाव हैं, जबकि उससे सटे बसीरहाट दक्षिण विधानसभा उपचुनाव में पिछले दिनों भाजपा को जीत हासिल हुई।

विधानसभा चुनाव से डेढ़ साल पहले राज्य में भाजपा का बढ़ता असर उस तृणमूल के लिए खतरे की घंटी है, जो शारदा घोटाले में अपने सांसदों-मंत्रियों की लिप्तता से पहले ही परेशान है। इस घोटाले में सीबीआई जांच का दायरा अब मुख्यमंत्री तक पहुंचने ही वाला है; जबकि सीबीआई द्वारा तलब किए जाने पर पार्टी महासचिव मुकुल राय ने कुछ दिनों की मोहलत मांग ली है। दरअसल मुकुल राय के इस खुलासे ने, कि शारदा चिटफंड के मालिक सुदीप्त सेन के साथ उनकी एक मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री भी मौजूद थीं, ममता बनर्जी को असहज कर दिया है। जबकि अब तक वह यही कह रही थीं कि शारदा चिटफंड के कर्ताधर्ताओं से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
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ममता बनर्जी इस पूरे मामले को मोदी सरकार द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग का उदाहरण बता रही हैं। जबकि लगातार आते विवरणों से साफ है कि ममता के मंत्री और सांसद शारदा चिटफंड का लगातार दोहन कर रहे थे। जिस पार्टी में ममता बनर्जी के आदेश के बगैर एक पत्ता तक नहीं खड़कता, भला कौन मानेगा कि उस पार्टी के नेता और मंत्री बगैर मुख्यमंत्री की जानकारी के शारदा चिटफंड का दोहन कर रहे थे? विकास की बाट जोहते पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार का यह खेल जितना त्रासद है, 'पोरिबर्तन' के नाम पर सत्ता में आई एक पार्टी का इतनी जल्दी अपनी छवि खो देना उससे कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है।
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