पूर्वी लद्दाख के चुमार सेक्टर में चीनी सैनिकों के भारतीय सीमा में घुस आने से पैदा हुआ गतिरोध दस दिनों के बाद भी जारी है। इससे पता चलता है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भले ही भारत प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सीमा संबंधी मसलों को जल्दी सुलझाने की प्रतिबद्धता जताई थी, लेकिन उनकी कथनी और करनी में फर्क है।
वास्तव में भारत और चीन के संबंधों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का अनसुलझा मसला सबसे बड़ा रोड़ा है, जिसकी तुलना मोदी ने पूरे शरीर को हिलाकर रख देने वाले दांत के दर्द से की थी। चुमार में जिस तरह से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जवानों की गतिविधियां जारी हैं, उससे जिनपिंग की भारत यात्रा से उपजा उत्साह ठंडा हो गया है।
असल में, चीन की जो शासन व्यवस्था है, उसमें सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव ही राष्ट्रपति होता है और वही सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का प्रमुख भी होता है। ऐसे में यह मानने का कोई कारण नजर नहीं आता कि भारतीय सीमा में पीएलए की यह हरकत चीनी सरकार की जानकारी के बिना जारी है। बल्कि हकीकत तो यह है कि भारत से लौटने के बाद जिनपिंग ने पीएलए के कुछ जनरलों को पदोन्नति दी है और पीएलए की तारीफ करने के साथ ही उसे 'क्षेत्रीय युद्ध' में विजयी होने के लिए तैयार रहने के लिए भी कहा है! आखिर ‘क्षेत्रीय युद्ध’ से उनका आशय क्या था? क्या उनका इशारा चुमार सेक्टर में जारी तनाव की ओर है?
हैरानी की बात यह है कि उनके इस बयान के आधार पर उपजी आशंकाओं को चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कोरी अटकलबाजी करार दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय भले ही इसे कमतर बताने की कोशिश कर रहा है, मगर सच यह है कि भारतीय सीमा में पीएलए के जवान अब भी मौजूद हैं। इस तनावपूर्ण स्थिति के चलते भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल दलवीर सिंह सुहाग को अपनी भूटान यात्रा तक रद्द करनी पड़ी है।
यही नहीं, जिनपिंग की यात्रा के दौरान ही चीनी सैनिकों और नागरिकों ने डेमचक क्षेत्र में भी घुसकर वहां चल रहे निर्माण-कार्य को रोकने की कोशिश की थी। बेशक इस बात की आशंका बिल्कुल नहीं है कि दोनों देशों के बीच यह तनावपूर्ण स्थिति युद्ध में तब्दील हो जाएगी, लेकिन चीन का यह व्यवहार यही बताता है कि उसकी नीयत में कहीं कोई खोट जरूर है।