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मणिपुर हमले के निहितार्थ

Fri, 05 Jun 2015 08:18 PM IST
नई दिल्ली
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पूर्वोत्तर भारत में सेना पर पिछले करीब तीन दशक में हुए सबसे भीषण हमले को सरकार ने गंभीरता से लिया है, थलसेनाध्यक्ष के तत्काल मणिपुर दौरे से इसका पता तो चलता है, पर सवाल यह है कि पूर्वोत्तर में शांति बहाली की दिशा में अब तक सार्थक पहल क्यों नहीं की जा सकी है।
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सच यह है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को बेअसर करने के प्रति हमारी सरकारों ने जितना जोर दिया, पूर्वोत्तर के उग्रवादी समूहों पर अंकुश लगाने की वैसी कोशिश नहीं की गई। यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया नाम से गठित उग्रवादी संगठनों के समूह पर भी वैसी गंभीरता नहीं जताई गई, जबकि बृहस्पतिवार को हुए हमले में इसी समूह का हाथ है, जिसमें एनएससीएन (खपलांग), उल्फा (स्वतंत्र), कामतापुर लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन, एनडीएफबी (संगबिजित) के अलावा स्थानीय उग्रवादी संगठनों की भी लिप्तता रही हो सकती है।

ये वे उग्रवादी गुट हैं, जो केंद्र सरकार के साथ हुए संघर्षविराम समझौते के दायरे से बाहर हैं, और जिन्हें पड़ोसी देशों, खासकर म्यांमार में शरण मिल रही है। असम में विगत दिसंबर में एनडीएफबी (संगबिजित गुट) द्वारा लगभग सत्तर लोगों की हत्या को केंद्र सरकार ने गंभीरता से भले लिया हो, पर उसने कहा था कि ऐसे गुटों के साथ वार्ता नहीं की जाएगी। विगत मार्च में एनएससीएन (खपलांग गुट) न सिर्फ संघर्षविराम समझौते से बाहर निकल आया, बल्कि विगत मार्च और अप्रैल में मणिपुर और नगालैंड में सेना के जवानों को निशाना बनाकर उसने अपनी बढ़ी ताकत का परिचय दिया।
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बृहस्पतिवार को म्यांमार सीमा से पंद्रह-बीस किलोमीटर भीतर मणिपुर में छह डोगरा रेजीमेंट के बीस जवानों को निशाना बनाने की घटना उग्रवादियों के इसी दुस्साहस की कड़ी है, जिसमें आईईडी के साथ पूर्वोत्तर में पहली बार रॉकेट चालित ग्रेनेड का इस्तेमाल हुआ। सिर्फ यही नहीं कि पूर्वोत्तर में उग्रवादी हमले की पूर्व सूचना न होना खुफिया चूक का उदाहरण है, बल्कि जांच का विषय यह भी है कि अशांत इलाके से गुजरते वे सैनिक क्या तय सुरक्षा व्यवस्था का पालन कर रहे थे। पूर्वोत्तर में समस्या का समाधान अब बड़ी पहलकदमी की मांग करता है।
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