संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 46वें भारतीय श्रम सम्मेलन में श्रमिकों को भरोसा जताया है कि उनकी सरकार सबकी सहमति के आधार पर ही श्रम सुधारों की दिशा में आगे बढ़ेगी। हालांकि न्यूनतम वेतन, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और भविष्य निधि और बोनस जैसे मसले लंबे समय से तो लटके हुए हैं ही, मुनाफा कमाने वाले सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों में विनिवेश और कुछ क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर भी सरकार को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
औद्योगिक विकास के मद्देनजर सरकार की चुनौतियों को समझा जा सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि तेज आर्थिक विकास श्रमिकों की कीमत पर न हो। प्रधानमंत्री मोदी शुरू से कौशल विकास पर जोर दे रहे हैं, ताकि उद्योगों को कुशल श्रमिक मिल सकें। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में प्रशिक्षुओं की संख्या बढ़ाने पर दिए जा रहे जोर को इसी से जोड़कर देखना चाहिए।
मगर इसके साथ यह भी समझने की जरूरत है कि देश को आईटीआई के साथ ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) से निकले युवाओं की भी उतनी ही जरूरत है। यह अचरज की बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ने आईआईटी और आईआईएम को हिंदू और विकास विरोधी बताकर उनकी उपयोगिता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं! जबकि सच यह है कि मेक इन इंडिया जैसी योजना को यदि एक ओर नवोन्मेष की जरूरत है, तो दूसरी ओर कौशल की भी।
सुखद है कि सरकार चिंतित है कि जब चीन और जापान में लाखों-करोड़ों की संख्या में एप्रेंटिस निकल सकते हैं, तो हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता। पर सवाल है कि क्या इसके लिए हमारे यहां वैसा बुनियादी ढांचा है। वास्तविकता यह है कि आईटीआई तो छोड़ें, प्राथमिक शिक्षा तक का पर्याप्त ढांचा नहीं है।
फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि औद्योगिक विकास और शहरीकरण के चलते बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा भी शहरों का रुख कर रहे हैं। इस दबाव को रोकने के लिए जरूरी है कि आईटीआई और पॉलिटेक्निक जैसे संस्थानों में ग्रामीण विकास और ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों से संबंधित पाठ्यक्रम विकसित किए जाएं। इसे श्रम सुधारों का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा सकता?