दो अमेरिकी पत्रकारों के बाद अब इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने तीसरे बंधक ब्रिटिश नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता डेविड हैंस की हत्या कर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पर दबाव बनाने की कोशिश की है। यदि यह खबर सही है कि उसके कब्जे में अब भी 24 से अधिक पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य लोग हैं, तो यह वाकई चिंता की बात है।
वह लगातार अमेरिका सहित तमाम देशों को जिस तरह चुनौती दे रहा है, उससे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी बेबस नजर आ रही है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने और उसके बाद अब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने आईएस के खिलाफ कार्रवाई करने की बात की है। आईएस जेहादी गुटों से इस मामले में कहीं अधिक खतरनाक है कि उसने हथियारों और वित्तीय संसाधनों का एक पूरा तंत्र विकसित कर लिया है।
एक तरह से यह सिर्फ आतंकी संगठन नहीं रहा, बल्कि एक राज्य की तरह व्यवहार कर रहा है और यही सबसे खतरनाक बात है। यह उस अफगानिस्तान से भी खतरनाक लगता है, जहां तालिबान और अल कायदा के खिलाफ 9/11 के बाद अमेरिका की अगुआई में कार्रवाई शुरू की गई थी।
हालांकि सोचने वाली बात यह भी है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाए जाने के बावजूद आतंकवाद खत्म नहीं हुआ है। ऐसे हालात के लिए कहीं न कहीं अमेरिका की नीतियां भी जिम्मेदार कही जा सकती हैं, जिनकी वजह से जख्म को नासूर बनते देर नहीं लगी। मसलन तीन वर्ष से भयंकर गृहयुद्ध से जूझ रहे सीरिया को देखें, तो अमेरिका वहां बशर अल असद को बेदखल करने के लिए पहले तो विद्रोहियों का समर्थन करता रहा है। मगर अब उसे आईएस से निपटना पड़ रहा है।
सीरिया में संयुक्त राष्ट्र के प्रयास भी नाकाम साबित हुए हैं। इराक का भी हाल ऐसा है कि वहां राजनीतिक स्थिरता नहीं आ सकी है। जाहिर है, बिना व्यापक सहमति के कोई भी कदम उठाने के कारगर नतीजे नहीं निकलेंगे। इस बीच, पेरिस में आईएस के खिलाफ संभावित कार्रवाई को लेकर एक अहम बैठक हुई है, जिसमें तीस से अधिक देश शामिल हुए हैं और इनमें दस अरब सुन्नी देश भी शामिल हैं। लेकिन ध्यान रहे कि अमेरिका इस अभियान को सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए, यह संगठन पूरी दुनिया के लिए चुनौती बनता जा रहा है।