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आतंकी नेटवर्क से कैसे निपटें

Fri, 22 Feb 2013 09:40 PM IST
नई दिल्ली
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हैदराबाद के दिलसुखनगर इलाके में हुए दो बम धमाकों से स्पष्ट है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए हमारे पास कोई ठोस रणनीति और मजबूत इच्छाशक्ति नहीं है। वर्ना ऐसा कैसे संभव है कि कुछ सिरफिरे एक भीड़ भरे इलाके में साइकिलों पर बम रख दें और उनके फटने तक किसी को कोई खबर न हो! इस हमले ने आंकड़ों में बदल चुके आम आदमी की सुरक्षा के सवाल को गहरे से रेखांकित किया है।
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आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हमसे आखिर कहां चूक हो रही है? खुद गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने स्वीकार किया है कि हैदराबाद, बंगलूरू सहित कुछ शहरों में आतंकी हमले की खुफिया जानकारी थी और उन्होंने इससे संबंधित राज्यों को अवगत कराया था। यदि ऐसा था, तो फिर हमले को टाला क्यों नहीं जा सका?

वास्तव में, 26/11 के हमले के दोषी अजमल कसाब और संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी के बाद आतंकी हमले की आशंका तो पहले से ही थी, इसके बावजूद यह हमला हुआ है, तो बीमारी के लक्षण ढूंढते रहने के बजाय उसकी जड़ में जाना अब जरूरी है।
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मुंबई हमले के बाद सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के प्रयास तेज हुए थे और उसके बाद ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) जैसी संस्थाओं का भी गठन हुआ, लेकिन उसके बाद से अब तक देश में छोटे-बड़े 11 आतंकी हमले हो चुके हैं। इसका साफ मतलब है कि सीमा पार से संचालित लश्कर और जमात-उद-दावा जैसे आतंकी संगठनों का नेटवर्क देश के भीतर बखूबी काम कर रहा है।

इस नेटवर्क तक हथियार और गोला-बारूद के साथ ही धन तो पहुंच ही रहा है, इसे आतंकी हमलों के लिए प्रशिक्षित भी किया जा रहा है। जरूरत इस नेटवर्क को तोड़ने की है। इसके लिए जरूरी है कि केंद्र तथा राज्य सरकारों और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच समन्वय स्थापित हो। मगर देखा तो यह गया है कि आतंकवाद के मसले पर यूपीए और गैर यूपीए सरकारों के बीच तीखे मतभेद हैं।

केंद्रीय एजेंसियों और स्थानीय पुलिस के बीच तालमेल का अभाव है। इसके अलावा कुछ राज्य आतंकवाद के खिलाफ अपना कानून भी बनाना चाहते हैं और कुछ जगह ऐसे कानून पहले से हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रस्तावित आतंकवाद विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) के अधिकार क्षेत्र और उसकी सीमाओं को लेकर भी मतभेद हैं। यह समझने की जरूरत है कि आतंकवाद से साझा संसाधनों और साझा प्रयास से ही निपटा जा सकता है।
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