समूचा उत्तर भारत पिछले कई दिनों से भीषण गर्मी के कारण त्राहि-त्राहि कर रहा है। सुबह उठते ही सूरज तपना शुरू करता है, दिन चढ़ने पर उसका सामना करना मुश्किल हो जाता है, और उसके ओझल होने के घंटों बाद तक उसकी मौजूदगी का तीखा एहसास होता रहता है।
तेज धूप और लू के कारण बाहर जाना मुश्किल है। जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, सड़कों पर जनजीवन मानो ठहर-सा जाता है। कपड़े से सिर ढके बिना सड़क पर चलना आफत को दावत देने जैसा है। आसमान से जैसे आग बरस रही है। इसके बावजूद कामकाजी लोगों के लिए घर से निकलना मजबूरी है। जबकि बच्चे मन मारकर घर में बैठे हैं। गर्मी की इस छुट्टी में खेलने और घूमने-फिरने की न जाने कितनी योजनाएं वे बना चुके थे। उन्हें घरों में दुबकने को मजबूर कर सूरज ने दरअसल उनकी इच्छाओं को ही झुलसा दिया है।
दिल्ली, इलाहाबाद, मथुरा से लेकर झारखंड में लू के थपेड़ों ने कई लोगों की जानें ली हैं। लोग तो लोग, बेजुबान पशु तक सूरज के प्रकोप से डरे-सहमे हैं। आगरा में भीषण गर्मी से आग लगने की कई घटनाएं हुई हैं, तो बागपत में तापमान ने छब्बीस साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। मैदानों की गर्मी से बचने पहाड़ों की ओर गए सैलानियों की परेशानी जरा भी कम नहीं हुई है। मसूरी, देहरादून से लेकर हिमाचल प्रदेश और जम्मू तक में गर्मी से लोग बेहाल हैं।
ग्रामीण इलाकों में लू से बचने के लिए फिर भी अमराइयों और पेड़ों-जंगलों का सहारा है, हालांकि चढ़ते तापमान से वहां सब्जियों की पैदावार झुलस रही है और राहत के कुएं और तालाब-सब सूख चुके हैं। लेकिन शहरी इलाकों में तो इनका भी सहारा नहीं। यहां तो भीषण गर्मी अपने साथ बिजली कटौती लाती है, जिससे हवा भी मुहाल है और पानी भी। बेतरतीब शहरी नियोजन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से हम भीषण गर्मी के इन दिनों में जिस तरह रूबरू होते हैं, उतना और कभी नहीं-चाहे वह सूखे नलों के नीचे खाली बाल्टियों की लंबी कतार के दृश्य हों, पहले पानी भरने के लिए होने वाली लड़ाइयां हों या शाम और देर रात को बिजलीघर पर हंगामा और तोड़फोड़ हो।
हर साल गर्मियों के इन दिनों में हम इन्हीं असुविधाओं से दो-चार होते हैं और इतने ही क्षुब्ध होते हैं, लेकिन तस्वीर नहीं बदलती। मानसून के इंतजार के अलावा राहत का क्या सचमुच कोई विकल्प है!