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सिविल सेवा में हिंदी की जगह

Fri, 25 Jul 2014 08:13 PM IST
नई दिल्ली
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सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा से सी-सैट को हटाने की मांग करते छात्रों को फिर से सड़कों पर उतरना पड़ा है, तो इसे समझा जा सकता है। पिछले ही दिनों इस मुद्दे पर आंदोलनरत छात्रों को सरकार ने बदलाव का आश्वासन दिया था। इसके बावजूद यूपीएससी ने प्रारंभिक परीक्षा के लिए एडमिट कार्ड जारी कर दिया, तो छात्रों का भड़कना स्वाभाविक था।
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जब से प्रारंभिक परीक्षा में वैकल्पिक विषय की जगह सी-सैट की व्यवस्था शुरू की गई है, तभी से सिविल सेवा में हिंदी समेत दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के छात्रों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सी-सैट का बड़ा हिस्सा कांप्रिहैंशन का है, जिसमें अंग्रेजीभाषी छात्रों को आसानी होती है, जबकि तकनीकी अनुवाद होने के कारण हिंदीभाषी छात्र पिछड़ जाते हैं। सी-सैट में गणित, तर्कशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता आदि से जुड़े ऐसे प्रश्न होते हैं, जो मेडिकल, इंजीनियरिंग और बैंकिंग की प्रतियोगी परीक्षा देने वालों के लिए ज्यादा मुफीद होते हैं। प्रारंभिक परीक्षा में भी सामान्य अध्ययन पर सी-सैट को तरजीह दी जा रही है। नतीजा यह है कि पहले जो हजारों हिंदीभाषी प्रत्याशी साक्षात्कार के स्तर तक पहुंच जाते थे, अब वे प्रारंभिक परीक्षा में ही विफल हो जा रहे हैं।

सी-सैट को लाने के पीछे प्रत्याशियों की क्षमताओं को बेहतर ढंग से आंकने और कुशल अभ्यर्थियों की खोज करने का उद्देश्य था। इसमें शक नहीं कि शीर्ष प्रशासनिक परीक्षा में योग्यता ही एकमात्र पैमाना होना चाहिए, पर ऐसी प्रणाली क्यों होनी चाहिए, जिसमें अंग्रेजी से इतर भाषाओं के साथ भेदभाव का सुबूत साफ दिखता हो?
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यह तो उन कमेटियों के सुझावों के भी विपरीत है, जिन्होंने भारतीय भाषाओं के माध्यम से सिविल सेवा में चयन को लोकतंत्र का समावेशी पक्ष बताया था। इसकी मौजूदा परीक्षा प्रणाली में बदलाव इसलिए भी जरूरी है कि यह विश्लेषण क्षमता के धनी अभ्यर्थियों की जगह प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने वालों को तरजीह देती है। इसी का प्रमाण है कि मुख्य परीक्षा का प्राप्तांक हाल के वर्षों में लगातार गिरता गया है। क्या उम्मीद करें कि सरकार द्वारा गठित कमेटी सी-सैट को बदलने के साथ सिविल सेवा परीक्षा में जरूरी दूसरे परिवर्तन पर विचार करेगी!
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