पिछले दो-तीन दिनों से पाकिस्तान सीमा पर लगातार जिस आक्रामकता का परिचय दे रहा है, वह बेहद गंभीर होने के साथ-साथ उसके दुस्साहस की पराकाष्ठा है, लिहाजा उसे उसकी शैली में जवाब देना ही चाहिए। संघर्ष विराम के जब-तब उल्लंघन के उसके सुबूत अब तक ज्यादातर बीएसएफ की चौकियों पर ही दिखते थे, लेकिन इन दिनों वह नागरिक आबादी को भी निशाना बना रहा है।
स्थिति की गंभीरता का एहसास इसी से होता है कि सीमांत के हजारों लोगों को उनके गांवों से निकालकर शिविरों में जगह दी गई है। सीमा के उस पार से हो रही इस गोलाबारी का तात्कालिक कारण विदेश सचिवों की बातचीत रोकने का हमारी सरकार का फैसला हो सकता है, जो पाकिस्तान को बर्दाश्त नहीं हो रहा।
अगर वार्ता का दबाव बनाने के लिए वह इस किस्म की हरकत पर उतर आया है, तो इसका उत्तर सिर्फ जवाबी कार्रवाई ही है। सीमा पर मुस्तैद हमारे जवान इस काम को बखूबी अंजाम दे भी रहे हैं। आतंकियों की खेप इस पार भेजने के लिए भी पाक रेंजर्स अकारण गोलाबारी करते हैं। पल्लावाला सेक्टर में सुरंग पाए जाने और कुपवाड़ा में आतंकियों के साथ मुठभेड़ की घटना इस ओर संकेत भी करती है। अगर यह सच है कि सीमा के इस पार सुरंग का पता चल जाने के कारण भी पाक आक्रामकता में तेजी आई है, तो यह उसकी हताशा और खतरनाक मंशा का ही एक और उदाहरण है।
इसके अलावा आंतरिक उथल-पुथल से ध्यान हटाने के लिए भी पाक सेना कश्मीर को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही हो, तो आश्चर्य नहीं। लेकिन पड़ोसी देश को यह समझना होगा कि उसकी यह चाल बार-बार सफल नहीं होने वाली। भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ता चाहता है, इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण समारोह में तमाम पड़ोसियों को बुलाया था। लेकिन अगर कोई इसे हमारी कमजोरी समझता है, तो यह उसकी गलती है।
इससे इन्कार नहीं कि पाक आक्रामकता का खामियाजा जम्मू-कश्मीर ही ज्यादा भुगतता है, लेकिन मौजूदा गोलाबारी के संदर्भ में राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पाकिस्तान से बातचीत की जो जरूरत बता रहे हैं, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। विदेश सचिव स्तर की वार्ता टूटी है, तो इसके लिए पाकिस्तान दोषी है। और अब भी जिस रवैये का परिचय वह दे रहा है, उससे उसके गंभीर और जिम्मेदार होने का पता तो कतई नहीं चलता।