जो ममता बनर्जी ईमानदार छवि की मानी जाती हैं, और काले धन पर केंद्र सरकार की निष्क्रियता के खिलाफ जिन्होंने अपने नेताओं को संसद में प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया, शारदा चिटफंड घोटाले में उनका अपने मंत्री की गिरफ्तारी के खिलाफ सड़क पर उतरने का फैसला हैरान कर देने वाला है।
परिवहन मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी के अगले ही दिन उन्होंने कोलकाता में आंदोलन किया, और अब राजधानी दिल्ली में ऐसा ही प्रदर्शन करने की उनकी योजना है। शारदा चिटफंड घोटाले में सत्तारूढ़ तृणमूल की लिप्तता के सुबूत न सिर्फ सामने आए हैं, बल्कि पार्टी के कुछ सांसदों की गिरफ्तारी भी हुई है। पर तब ममता बनर्जी इतनी आक्रामक नहीं थीं; बल्कि कुणाल घोष को तो उन्होंने निलंबित कर दिया था।
चिटफंड घोटाले में असंख्य गरीबों ने अपनी गाढ़ी कमाई खो दी है। पर उनके साथ खड़े होने के बजाय राज्य की मुख्यमंत्री अपने उस गिरफ्तार मंत्री के समर्थन में कूद पड़ी है, जिनकी छवि अच्छी नहीं बताई जाती और सीबीआई की शुरुआती पूछताछ में ही जिनके खिलाफ काफी सुबूत निकल आने के ब्योरे हैं।
मंत्री की गिरफ्तारी से क्षुब्ध तृणमूल कार्यकर्ताओं ने जिस तरह हंगामा किया, और अदालती कार्यवाही में बाधा पहुंचाने की कोशिश की, उसके बाद यह आशंका भी होने लगी है कि घोटाले के इस मामले की अबाधित और निष्पक्ष सुनवाई राज्य में हो सकेगी या नहीं।
दीदी के आक्रामक होने के पीछे शायद यह भय है कि शारदा मामले में गिरफ्तार मंत्री के खुलासे सत्ता से जुड़े कुछ और भ्रष्ट चेहरों पर से नकाब न उतार दें। पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से है, जहां की सत्ता राजनीति ताकत और हिंसा का प्रदर्शन करने में कुख्यात है, और जहां हर विफलता का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ दिया जाता है।
अपनी जीत को 'पोरिबर्तन' बताने वाली ममता बनर्जी भी, दुर्योग से, उसी पिटे-पिटाए रास्ते पर चल रही हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर करीब साढ़े तीन वर्षों के उनके कार्यकाल में एक उपलब्धि नहीं है, जबकि विवाद और विफलताएं कई हैं।
नरेंद्र मोदी, अमित शाह और सीबीआई को निशाना बनाकर दीदी अपने समर्थकों को तो खुश कर सकती हैं, पर वास्तविक बदलाव का इंतजार कर रही राज्य की जनता को नहीं। बल्कि अगले डेढ़ वर्षों में दो चुनाव उनकी कड़ी परीक्षा लेंगे। विफल दीदी की हताशा की वजह यह भी हो सकती है।