धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिवाली का जो दिन सियाचिन में सैनिकों और कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों के साथ गुजारने के लिए चुना, उसी दिन सीमा पर गोलाबारी तेज करने के साथ-साथ कश्मीर पर भारत की कथित आक्रामकता के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के लिए संसद में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान ने फिर से अपनी कुंठा का परिचय दिया है।
पाकिस्तान की इस हताशा की एक वजह तो यही है कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव से पहले माहौल शांत है और बाढ़ का बेहतर ढंग से मुकाबला करने के कारण केंद्र सरकार के प्रति सूबे की जनता का रवैया भी पहले से बदला हुआ है। इसके अलावा सीमा पर पाक गोलाबारी का जिस मजबूती के साथ जवाब दिया जा रहा है, वह भी इस्लामाबाद के लिए अप्रत्याशित है। हालांकि दिवाली के दिन प्रधानमंत्री के कश्मीर दौरे की घाटी के अलगाववादी संगठनों ने आदतन आलोचना ही की है। कोई चाहे, तो जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव से पहले बाढ़ पीड़ितों से मुलाकात और पाक आक्रामकता के बीच सियाचिन में सैनिकों को प्रोत्साहित करने की पहल को केंद्र सरकार की सुविचारित योजना के रूप में देखने के लिए स्वतंत्र है।
लेकिन करीब पांच महीने में नरेंद्र मोदी के चौथे कश्मीर दौरे और लगभग एक दशक बाद फिर किसी प्रधानमंत्री के सियाचिन पहुंचने को सिर्फ सियासी एजेंडा बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। बल्कि बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए एक और पैकेज देकर, भले ही वह पर्याप्त न हो, प्रधानमंत्री ने कश्मीरियों का दिल जीतने की कोशिश की है। इन्हीं सब वजहों से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और बिलावल और मुशर्रफ की आक्रामक टिप्पणियों के बाद खुद नवाज शरीफ भी अब कश्मीर मुद्दे पर मुखर हैं।
जो देश अपने यहां आतंकी हमलों को रोक पाने में लगातार विफल है; क्वेटा में हुआ हमला जिसका ताजा उदाहरण है, उसका कश्मीर की चिंता में दुबले होने का तो कोई औचित्य ही नहीं बनता। बल्कि संयुक्त राष्ट्र से दोटूक जवाब मिलने के बाद कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण की अपनी ताजा कोशिशों को विराम देना ही पाकिस्तान के हित में होगा।