यह बताने की जरूरत नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से संबंधित बातचीत का रास्ता खुलना भारत के लिए सचमुच कितना महत्वपूर्ण है। चूंकि सुरक्षा परिषद का ढांचा लंबे समय से एक ही ढर्रे पर चल रहा है, और यूरोप तथा पांच स्थायी सदस्यों के हितों के पक्ष में उसका झुकाव साफ-साफ दिखता है, इस कारण अनेक देश पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से सुरक्षा परिषद का विस्तार और उसके मौजूदा ढांचे में बदलाव चाहते हैं।
दूसरी ओर, सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से ज्यादातर न सिर्फ यथास्थिति बनाए रखने के पक्षपाती हैं, बल्कि दुनिया की इस सबसे बड़ी पंचायत में अब तक बदलाव से संबंधित कोई प्रस्ताव भी नहीं आया था। इस लिहाज से सुरक्षा परिषद के विस्तार से संबंधित चर्चा को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सर्वसम्मति से मिली मंजूरी को स्वाभाविक ही एक ऐतिहासिक घटनाक्रम बताया जा रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की दावेदारी जता रहे भारत के लिए सचमुच यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।
भारत लंबे समय से इसकी मांग करता आ रहा है और केंद्र की सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने हर विदेशी दौरे में यह मुद्दा उठाया है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने, उत्तरोत्तर एक आर्थिक शक्ति बनने, संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना में उल्लेखनीय भूमिका निभाने और अनेक सदस्य देशों का समर्थन होने के कारण भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलनी ही चाहिए।
अलबत्ता स्थायी सदस्यता का मामला इतना आसान भी नहीं है। अभी तक सिर्फ ब्रिटेन और फ्रांस ने ही स्थायी सदस्यता की भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन किया है। अमेरिका और रूस ने भारत को मौखिक समर्थन ही दिया है, और ये दोनों देश सुरक्षा परिषद में सुधार से संबंधित चर्चा के पक्ष में भी नहीं हैं। जबकि चीन का भारत-विरोधी रुख जग-जाहिर है।
इसके अलावा भी कॉफी क्लब जैसा संगठन, जिसमें पाकिस्तान है, पिछले काफी समय से सुरक्षा परिषद में सुधार का विरोध कर रहा है। लेकिन सुरक्षा परिषद में सुधार के ये तमाम विरोधी सुधार से संबंधित वार्ता के प्रस्ताव को नहीं रोक पाए, क्योंकि उनके पक्ष में पर्याप्त वोट नहीं हैं। इसी कारण सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की उम्मीद भी बंधती है।