बीते सप्ताह आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पेश करने के तत्काल बाद कुछ जनप्रतिनिधियों ने संसद की मर्यादा को तार-तार कर दिया था, तो कल इस विधेयक को पारित करने की जल्दी में मनमोहन सिंह सरकार उससे भी दो कदम आगे निकल गई।
बेशक सरकार के भीतर यह आक्रामकता मुख्य विपक्षी पार्टी द्वारा सहयोग का आश्वासन देने के बाद ही आई; भाजपा ने अपना वायदा निभाया भी। लेकिन तब भी इसकी कल्पना नहीं थी कि कोई सरकार विधेयक पारित करवाने की जिद में लोकसभा के तमाम दरवाजे बंद करने और कार्यवाही का प्रसारण रोकने की हद तक जा सकती है। विद्रूप देखिए, बंद दरवाजों के भीतर भी यह विधेयक बगैर चर्चा के पारित हुआ, जिसके विरोध में जदयू और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों को वॉकआउट करना पड़ा।
संसद और लोकतंत्र की गरिमा को ताक पर रखने का यह उदाहरण यूपीए का नेतृत्व कर रही उसी राजनीतिक पार्टी ने दिया है, जिसके हिस्से में देश पर आपातकाल थोपने का अपयश है। जो सरकार सूचना के अधिकार कानून को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश करती है, उससे यह सवाल पूछना ही चाहिए कि उसने लोकसभा की कार्यवाही का प्रसारण क्यों रोका- क्या इसलिए कि जनता विधेयक पारित होने की प्रक्रिया न देख पाए या इसलिए कि पृथक तेलंगाना के मुद्दे पर संसद के भीतर का विरोध बाहर न दिखाई पड़े!
सवाल यह नहीं है कि एक स्वतंत्र राज्य के तौर पर तेलंगाना का गठन होना चाहिए या नहीं, प्रश्न यह है कि 2004 में किया गया वायदा पूरा करने के लिए 2014 में यूपीए सरकार इस हद तक क्यों चली गई है कि उसे अपनी पार्टी में विरोध व दरार और संसद की मर्यादा तक का ध्यान नहीं है। हालत यह है कि तेलंगाना का मुद्दा नेपथ्य में चला गया है, और उसे किसी भी तरीके से पारित कराने की केंद्र सरकार की जिद ही उभर कर सामने आई है।
विडंबना यह है कि एक महत्वपूर्ण विधेयक के लोकसभा में इस तरह पारित होने का सत्ता पक्ष बचाव कर रहा है। गृह मंत्री की टिप्पणी है कि संसद में इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं। एक दशक में जिस सरकार की छवि रसातल में चली गई हो, वह लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह का उदाहरण पेश कर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रही है।