कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इतिहास अपने आपको दोहराता है, पहली बार त्रासदी और दूसरी बार प्रहसन के रूप में। भारतीय राजनीति की यह त्रासदी ही है कि इतिहास बार-बार प्रहसन के रूप में खुद को दोहरा रहा है। श्रीलंका के मुद्दे पर द्रमुक प्रमुख करुणानिधि के समर्थन वापसी के फैसले के बावजूद लगता नहीं कि यूपीए सरकार को किसी तरह का खतरा है।
सरकार के अल्पमत में आने के बाद भी यह घटनाक्रम एक लंबे नाटक के अंतराल की तरह ही लगता है। पर्दा फिर उठ जाएगा और उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा, क्योंकि एक बार फिर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सरकार की नैया पार लगाने को तैयार हैं।
ऐसा तब भी हुआ था, जब खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने यूपीए से किनारा किया था। तब उत्तर प्रदेश की इन्हीं दोनों प्रतिद्वंद्वी पार्टियों ने उसे संकट से उबारा था। यह सिद्धांत या नैतिकता का मामला नहीं, बल्कि विशुद्ध राजनीतिक नफे-नुकसान का गणित है। इसी गणित में यूपीए से पहले मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन और झारखंड विकास पार्टी जैसे दल भी अलग हो चुके हैं।
मगर जैसा कि दिल्ली में अपनी विराट महत्वाकांक्षा का इजहार करने वाले नीतीश कुमार ने कहा है कि द्रमुक के समर्थन वापस लेने के फैसले से सरकार को फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि कांग्रेस सत्ता में बने रहने का 'कौशल' जानती है। वाकई यदि मुद्दा अहम होता, तब तो जयललिता को अपने घनघोर प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि के फैसले से खुश होना चाहिए था। मगर उन्होंने भी द्रमुक के फैसले को ड्रामा करार दिया है।
और बात सही भी है, क्योंकि श्रीलंका का मामला चार वर्ष पुराना है। वर्ष 2009 में जब श्रीलंका का गृहयुद्ध चरम पर था, तब करुणानिधि ने यूपीए सरकार पर समर्थन वापस लेने का दबाव बनाने के बजाय महज चार घंटे उपवास रखकर काम चलाया था। यूपीए को चौतरफा घिरा देखकर भाजपा अभी जरूर खुश हो रही होगी, लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार फिलहाल सुरक्षित दिख रही है।
उधर वाम दलों की हैसियत ऐसी रही नहीं कि वे सरकार को कुछ खास नुकसान पहुंचा सकें। विडंबना ही है कि यह राजनीतिक प्रहसन अगले चुनाव तक जारी रहेगा।