भूस्खलन की वजह से नेस्तनाबूद हो गए महाराष्ट्र के मालिण गांव में मानो यह त्रासदी बस अपने होने का इंतजार ही कर रही थी। 90 के दशक में बनाए गए डिंभे बांध के नजदीक पहाड़ियों से घिरे इस गांव में दो दिन की बारिश ने ऐसा कहर ढाया कि मिट्टी और मलबे में पूरा गांव ही कई फीट नीचे दब गया!
पुणे से सवा सौ किमी दूर यह गांव ऐसी दुर्गम जगह पर स्थित है, जहां राष्ट्रीय आपदा निवारण दल (एनडीएफआर) की टीम को पहुंचने में ही कई घंटे लग गए। इस हादसे के लिए जितने प्राकृतिक कारण जिम्मेदार हैं, उससे कम मानवीय कारण नहीं हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि खेती के लिए जमीन को समतल करने के लिए यहां पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई है, जिससे जमीन पोली हो गई है। लिहाजा, थोड़ी सी बारिश में ही यहां भूस्खलन का खतरा बना रहता है। यह विडंबना ही है कि आदिवासी बहुल इस गांव के अधिकांश लोग पहले ही डिंभे बांध की वजह से विस्थापन की पीड़ा भोग चुके हैं और अब उन पर यह हादसा कहर बनकर टूटा है।
वास्तव में इस हादसे ने एक बार फिर विकास की हमारी अवधारणा पर सोचने को मजबूर किया है, जिसका खामियाजा अक्सर वंचित और आदिवासी तबके को ही उठाना पड़ता है। इसके साथ ही ऐसा भी लगता है कि पिछले वर्ष उत्तराखंड में आई भयावह प्राकृतिक आपदा के बावजूद न तो नीतियों में और न ही नीयत में कोई बड़ा फर्क आया है।
उत्तराखंड की तबाही के पीछे भी वनों की अंधाधुंध कटाई, बांध और धड़ल्ले से हो रहे निर्माण ही जिम्मेदार रहे हैं। पिछले वर्ष की तबाही से अभी राज्य पूरी तरह उबर भी नहीं पाया है कि बारिश और भूस्खलन की मार झेलनी पड़ रही है।
निश्चय ही, आपदा प्रबंधन की स्थिति में पहले से काफी सुधार हुआ है, जैसा कि उत्तराखंड में भी देखा गया और अभी पुणे के पास हुए हादसे में भी देखा जा सकता है, जहां चार सौ से अधिक जवान जुटे हुए हैं। मगर मालिण की घटना के बाद भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के विशेषज्ञों ने डिंभे बांध के आसपास पांच किलोमीटर के दायरे में बसे गांवों में भी भूस्खलन की आशंका जताई है।
जाहिर है, मालिण गांव में राहत और बचाव कार्य के साथ ही इन गांवों के लोगों के पुनर्वास के बारे में भी सोचने की जरूरत है।