कश्मीर में चार वर्ष पुराने मच्छेल फर्जी मुठभेड़ मामले में दो अधिकारियों समेत सात सैन्यकर्मियों को दी गई उम्रकैद की सजा उन तमाम लोगों के लिए सबक है, जो तरक्की और इनाम के लिए निर्दोष लोगों की हत्या करने में गुरेज नहीं करते। इस मामले में भी कुछ सैन्यकर्मियों ने पहले सुनियोजित ढंग से तीन निर्दोषों को विदेशी आतंकवादी बताकर मार डाला, बाद में स्थानीय लोगों के आक्रोश को ताकत के बल पर दबाने के क्रम में भी अनेक लोगों की जान गई थी!
यह अपने अधिकारों के दुरुपयोग की ही नहीं, बल्कि अन्याय की भी पराकाष्ठा थी। चौतरफा दबावों के बीच सेना ने इस मामले की जांच की और दोषी सैन्यकर्मियों को दंडित किया। बेशक कोई सजा घाटी के उन तीन लोगों की अन्यायपूर्ण मौत की भरपाई नहीं कर सकती, पर इससे वहां कानून-व्यवस्था और न्याय के प्रति आस्था लौटने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। सैन्य अदालत का यह फैसला कई और कारणों से महत्वपूर्ण है। थोड़े ही दिनों पहले बडगाम में सेना ने एक कार को निशाना बनाते हुए अंधाधुंध गोलीबारी की थी, जिसमें दो युवा मारे गए और दो घायल हुए थे। इस घटना में भी सैनिकों ने कार की जांच किए बिना उसे निशाना बनाया था।
यह उस सेना का गैरजिम्मेदार रवैया था, जिसने थोड़े ही समय पहले बाढ़ के समय अपने मानवीय आचरण से घाटी के लोगों का दिल जीता था। बाद में हालांकि सेना ने अपनी गलती स्वीकारी, जो घाटी जैसी जगह में एक विरल घटना थी, और जांच में सहयोग देने का भी आश्वासन दिया। उम्मीद करनी चाहिए कि मच्छेल के गुनाहगारों को मिली सजा बडगाम जैसी घटनाओं को रोकने में मददगार साबित होगी।
जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव से पहले सेना की छवि के लिहाज से भी सैन्य अदालत के इस फैसले का महत्व है, क्योंकि अलगाववादी संगठन ऐसी ही सैन्य निरंकुशताओं के मुद्दे उठाकर न सिर्फ सेना की मौजूदगी पर, बल्कि घाटी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हैं। इस तरह की घटनाएं केंद्र की उस एनडीए सरकार के लिए भी चुनौती की तरह हैं, जो जम्मू-कश्मीर में शांति और स्थिरता की नई पहल करना चाहती है।