राजधानी दिल्ली के नजदीक ग्रेटर नोएडा के एक गांव बिसाहड़ा में जो कुछ हुआ, उसने हमारी सामूहिक चेतना को झकझोर कर रख दिया है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ऐसे अपराध के लिए, जिसकी पुष्टि होना अभी बाकी है, किसी व्यक्ति की सैकड़ों लोगों की भीड़ इतनी बर्बरता से पिटाई कर दे कि उसकी मौत ही हो जाए! यदि यह घटना किसी को स्तब्ध नहीं करती, तो इसका मतलब है कि वह चेतनाशून्य हो चुका है।
ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं, लेकिन ऐसी घटना की पुनरावृत्ति यही बताती है कि एक समाज के रूप में हम कहीं चूक रहे हैं। वरना तो हम एक ऐसे लोकतंत्र का हिस्सा हैं, जिसमें हमें अपने कानून के राज पर गर्व होता है। दुनिया में यही हमारी पहचान भी है। इसमें भीड़ को अपना न्याय सुनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। और यह भी, कि हम तमाम टकरावों के बावजूद एक ऐसा समाज हैं, जिसमें वैमनस्य के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
कथित रूप से पशुवध के आरोप में भीड़ के हाथों जो शख्स मारा गया, उसका परिवार तीन पीढ़ी से उसी गांव में रह रहा था। तीन पीढ़ी से जिस गांव की मिट्टी और रोटी से उनका साझा था, उसी गांव के लोगों से अचानक ऐसी दुश्वारियां क्यों हो गईं? उनके बीच की रिश्ते और विश्वास की वह डोर कैसे अचानक टूट गई? भावनाओं पर उत्तेजनाएं जब हावी होने लगती हैं, तब हम अपना सामूहिक विवेक भी खोने लगते हैं। और तब भीड़ कानून-व्यवस्था को दरकिनार कर अपना फैसला सुनाने लगती है। क्या यह हम सबकी साझा नाकामी नहीं है?
असल में ऐसे ही नाजुक मौके एक समाज के रूप में हमारे लिए परीक्षा की घड़ी की तरह होते हैं। अब इस घटना के बाद तमाम राजनीतिक दलों के बीच जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उससे समझ जाना चाहिए कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। लगता तो यह भी है कि अतीत में हुई सांप्रदायिक हिंसा की ऐसी तमाम घटनाओं के बावजूद कोई सबक नहीं लिया गया है। यह मामला और भड़के, उससे पहले सबको सौहार्दपूर्ण माहौल बनाने की पहल करनी चाहिए।