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हेमाजी की नृत्यशाला

Wed, 10 Feb 2016 03:40 PM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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कला जगत में हेमा मालिनी की दो तरह की पहचान है। एक स्वरूप में वह फिल्म जगत की ड्रीम गर्ल हैं, जिसमें उनके साथ जानी मेरा नाम, खुशबू, सीता और गीता,  प्रेम कहानी, शोले जैसी कई फिल्मों की शोहरत जुड़ी हुई है। दूसरे रूप में उनके उस स्वरूप को आदर दिया जाता है जिसमें वह भरतनाट्यम के माध्यम से शास्त्रीय नृत्यों का मंचन करती रही है। एक तरह से उस संरक्षण करती रही है। स्वाभाविक है कि उन्हें बालीवुड से प्रसिद्धि मिली और कला के गूढ़ मर्मज्ञ लोग ही उनके शास्त्रीय मंचों तक पहुंचे। हालांकि उनके एक स्टार नायिका होने के नाते यह खबर सबको रही कि फिल्मों के अलावा हेमा मालिनी अपने शास्त्रीय नृत्यों के कार्यक्रम में देश दुनिया में अपनी नृत्य का प्रदर्शन करती हैं।
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हेमाजी का अपना एक पूरा ग्रुप है और बाद में तो उनकी दो बेटियां भी उनके साथ मंचों को और कलात्मक और भव्य  बनाने लगी। इस बात तक किसे गुरेज था। इस बात से भी क्यों ऐतराज होता कि उनकी यदि राजनीति में आने की इच्छा हुई तो एक राजनीतिक पार्टी ने राज्यसभा का टिकट दे दिया। और आगे लोकसभा भी लड़ा लिया।  यहां कुछ असहमति के स्वर उभरे हैं तो उसके पीछे उनकी कला पर सवाल नहीं, एक नेता के रूप में समाज के प्रति उनकी उदासीनता पर प्रश्न है। तब सवाल यह भी है कि शास्त्रीय नृत्य के लिए अब उन्हें यह जमीन इस ओने पोने भाव मे किस आधार पर दी जाए। और सवाल यह भी कि एक सांसद के रूप में वह अपने क्षेत्र केलिए समय नहीं निकाल पाती हैं, फिर एक शास्त्रीय नृत्यशाला के लिए वक्त कहां से निकलेगा। शास्त्रीय नृत्यशाला अकादमी खुल भी जाती तो वह आखिर किन हाथों में होती कौन उसे संचालित कर रहे होते। क्या हेमा मालिनी वहां अपना समय दे रही होंगी। सेलिब्रिटी के नाम पर जो अकादमियां चल रही हैं, या जिसके लिए जमीन- सहूलियतें मांगी गई हैं उसके परिणाम बहुत संतोषजनक नहीं रहे।  आम लोगों तक उसकी पहुंच नहीं रही।

ज्यादातर अकादमियां चाहे वह खेल की हो या कला की, उसमें ऊंचे प्रभालशाली तबके ने ही उसका लाभ उठाया। और उन अकादमियों को प्राइवेट स्कूल की शैली में ही चलाया गया। कुछ ही जगहों पर शासन से अनुग्रहित अकादमियां अपने लक्ष्यों के अनुरूप रही। ऐसे में सवाल यह भी कि किस मापदंड में हेमामालिनी अकादमी के लिए जमीन प्राप्त करने की हकदार होती हैं। क्या इसलिए कि वह भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी की सांसद हैं। क्या नृत्य कला के लिए दूसरे कलाकारों ने भी ऐसी कोई अपेक्षा की थी। तब पूछा यह भी जा सकता है कि कला के क्षेत्र से राजनीति में आने पर जिस तरह वह लोगों ने उन्हें अपना प्रतिनिधि बनाया, क्या वह अब तक अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति न्याय कर पाई हैं। क्या वह एक बेहतर जनप्रतिनिधि के रूप में सामने आ पाई हैं। कला और राजनीति का घालमेल किसी भी रूप में नहीं होना चाहिए।  सीता और गीता के लिए उनकी प्रशंसा हो सकती है या फिर शोले की बसंती के लिए। लेकिन जनप्रतिनिधि के तौर पर यही संकेत मिलते हैं कि वह पूरी तरह उदासीन हैं और क्षेत्र के लोगों के प्रति उनका ज्यादा नाता नहीं रहता। ऐसे में किस सामाजिक सरोकार के लिए उनके किसी आग्रह को माना जाता। जहां तक नृत्य निपुणता की बात है तो वह कुशल नृत्यांगना जरूर हैं अपनी-अपनी विधा में अकेली नहीं।
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यह भी देखा गया कि सांसद रहते हुए उन्होंने शायद ही कभी कला नृत्य पक्ष के यहां तक कि फिल्म जगत से सरोकार रखने वाले सवाल उठाए हैं। मंचों से उन्होंने जब भी बोला राजनीति वाली शैली में ही बोला। चुनाव जीतने और दूसरों के लिए वोट मांगने के उनकी सभाओं कोदेखा। वह उस बिहार में भी गई जहां की राजनीति से उनका सीधा वास्ता न था। लेकिन पार्टी ने उन्हें ग्लैमर रूप को सामने रखना चाहा। पर वह ऐसी सांसद नहीं बन सकी जो बिहार में लालू यादव से पूछ सके कि यहां मेरी गाल की तरह मुलायम सड़कें क्यों नहीं हैं। लालू से सवाल करने से पहले उन्हें बताना होता कि हेमा ने दशक की राजनीति में समाज को क्या दिया है। कला माध्यम नहीं बनता। कला से टिकट मिल सकता है। इसके आगे आपको अपने काम से लोगों से संवाद बनाना होता है। यह उपलब्धि हेमा के पास नहीं थी। हेमा मालिनी फिल्मों में आई। लंबे संघर्ष और असफलता के बाद निराशा तब दूर हुई जब उन्हें राज कपूर की फिल्म सपनो का सौदागर मिली  वरना एक समय तो तमिल के एक निर्देशक ने यह तक कहा था कि उनमें स्टार वाला चार्म नहीं। लेकिन हेमा मालिनी को सफल होना था। सपनों का सौदागर से ही उन्होंने अपने अभिनय क्षमता का अहसास कराया। वह ड्रीम गर्ल्स पहली फिल्म से कहलाई। इसके बाद 1970 में जानी मेरा नाम,  अंदाज, सीता और गीता से होते हुए सत्तर के दशक के मध्य में शोले धर्मात्मा,  संन्यासी सफल फिल्मों की एक लंबी कहानी है। बेशक उनके पास मदर इंडिया, मुगले आजम जैसी कोई कालजयी फिल्म नहीं रही। लेकिन बालावुड में सत्तर और अस्सी के शुरु में आई फिल्मों में हेमा मालिनी के सौंदर्य और अभिनय की छाप लोगों के मन में रही। हेमा मालिनी की आदाकारी पसंद की गई। वैजयतीं माला, वहीदा रहमान, नर्गिस के दौर के बाद इंडस्ट्री में हेमा की ख्याति थी। जो लोग भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की समझ रखते थे उनके लिए भी, और जो हेमा को कहीं भी देखना निहारना चाहते थे, वे सब उनके शास्त्रीय आयोजनों में भी पहुंचे। ऐसे आयोजन जहां हेमा ज्यादा दिव्य, कुशल, संजीदा थी। कभी गंगा अवतरण, कभी दुर्गा आराधना तो कभी महिषासुर मर्दन के दश्यों , भाव को हेमा ने जब मंच पर साकार किया तो कला का सुंदर रूप सामने आया। हेमा मालिनी भारतीय शास्त्रीय नृत्य को दुनिया के ओर छोर में ले गई। फिल्मों से जितना समय बच सकता था उन्होंने अपनी इस सीखी हुई विद्या का सदुपयोग किया। हेमा मालिनी के शोज हमेशा लोगों को प्रभावित करते रहे। उनकी अपनी ख्याति बनी रही।

हेमा मालिनी जैसी स्टार भाजपा से जुड़ी तो राज्यसभा की सीट मिलनी ही थी। वह उन्हें दी गई। और ऐसा भी समय आया कि मथुरा की पेचिदा सीट पर हेमा मालिनी को उतार दिया गया। मोदी के लिए बनी लहर से भला मथुरा क्यों अछूता रहता। वह चुन ली गईं। एक कलाकार के इस मुकाम को बर किसी ने सराहा। लेकिन कला की पगडंडियों पर चढ़ते हुए जब आप राजनीति में कुछ हासिल करना चाहते हैं तो जमाना फिर आपको किसी और कसौटी में कसता है। बल्कि ज्यादा चुनौतीपूर्ण। क्योंकि वह कलाकार को संवेदनशील मानता है। खास तौरतरीकों के साथ जीने के अभ्यस्त हो चुके नेताओं के बजाय वह कलाकार से थोड़ी संवेदना की अपेक्षा करता है। इसलिए जब हेमा मालिनी की कार से कोई टकराता है तो उनसे संवेदनशील टिप्पणी की ही नहीं,  घटना पर किसी की जिंदगी बचाने के लिए सक्रियता की अपेक्षा करता है। यह सवाल तो बाद का कि घटना के लिए दोषी कौन था। वहां कलाकार का ठहरना और अपने स्तर पर कुछ उपाय करना, लोगों के मन में सेलिब्रिटी के लिए इज्जत बढ़ाता है।  हेमा वहां न ठहरी। बाद में उनका ट्वीट आया।

नया किस्सा जमीन का है। सवाल यही कि जमीन इस तरह क्यों दी जानी चाहिए। फिर एक उस कलाकार को जो किसी खास राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हो। इस बात का अर्थ नहीं कि बीस साल वह इस जमीन के लिए संर्घष करती रही। फिर कहा यह भी जाएगा कि इसी समय वह जमीन क्यों मिली। क्या अकादमी बनने के बाद हेमा के पास इतना वक्त है कि वह युवाओं को नृत्य का कौशल दे सके। केवल एक ढांचा खड़ा होगा। नाम बेशक हेमा का होता, बाकी सब कुछ पुरानी चली आ रही कार्यशालाओं की तरह । हेमा मालिनी भूल गई कि वह नृत्यांगना जरूर है। लेकिन उन्होंन एक संसदीय क्षेत्र में लोगों से कुछ करने के आश्वासन पर वोट मांगे हैं। उनकी बड़ी जिम्मेदारी वहां हैं। नृत्य सिखाने से कई ज्यादा जरूरी है कि वह मथुरा को अच्छा बनाने में अपना योगदान दे। नृत्य उनकी मंशा है, सांसद होना जिम्मेदारी। समाज  नेता बने कलाकार का सम्मान तभी कर पाएगा जब वह अपनी जिम्मेदारियों का अहसास करता हो। अगर मथुरा के लोग उन्हें अपने बीच न पाएं तो उनकी ये अकादमियां किस तरह खड़ी होंगी और वहां की गतिविधियां कैसी होंगी समझा जा सकता है। हेमा मालिनी या लोकसभा में आया कोई भी कलाकार, खिलाड़ी उनकी पहली जिम्मेदारी अपने क्षेत्र का कामकाज है। यहीं गोविंदा भटके, धमेंद्र भटके, विनोद खन्ना भटके। अगर हेमा को बीस साल बाद जमीन इस मूल्य पर उपलब्ध हो भी रही थी , तो उन्हें पसीज जाना चाहिए था। आखिर वो एक कलाकार हैं। महसूस करना चाहिए था कि कला ने उन्हें यश धन सम्मान सब कुछ दिया, उस कला के नाम पर ऐसा सौदे के लिए प्रयास न करूं। वह इस जमीन को लेने से पीछे हटती हैं तो उनका सम्मान होगा। दूसरे भी चेष्टा नहीं करेंगे।
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