यह बेशक आश्वस्त करने वाली बात है कि तालिबान के लड़ाकों को उनकी मंशा में कामयाब नहीं होने दिया गया, पर अफगानिस्तान की संसद को निशाना बनाकर उन्होंने अपने इरादे तो साफ कर ही दिए हैं कि आने वाले दिन वहां के लिए और अशांत होने वाले हैं। दरअसल तालिबान का दुस्साहस तो पिछले साल के अंत में नाटो फौज की अफगानिस्तान से औपचारिक विदाई के बाद ही बढ़ गया था। यह आशंका थी ही कि विदेशी सैनिकों के विदा होने पर मुल्क में हिंसक घटनाएं बढ़ सकती हैं। यह मानने का भी कारण नहीं है कि नाटो फौज की विदाई से कुछ पहले राष्ट्रपति पद संभालने वाले अशरफ गनी को इसका आभास नहीं रहा होगा।
लेकिन यह साफ है कि उनसे जिस नेतृत्वकारी भूमिका की उम्मीद रही है, कम से कम शुरुआती दौर में उसका परिचय नहीं मिला है। यह चौंकाने वाली बात है कि दुनिया के अस्थिर देशों में शुमार अफगानिस्तान में रक्षा मंत्री का पद कई महीनों से इसलिए खाली पड़ा है कि इस पर राष्ट्रपति और मुख्य कार्यकारी के बीच सहमति नहीं बन पाई। सिर्फ यही नहीं कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत रक्षा मंत्री का जिस समय सांसदों से परिचय कराया जा रहा था, तालिबान ने ठीक उसी समय संसद को निशाना बनाने की कोशिश की, बल्कि हमले की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इसका जिक्र भी किया है।
संसद के दरवाजे तक तालिबान के आ धमकने से उस अफगान सुरक्षा बल की काबिलियत पर भी सवाल उठते हैं, जिसे नाटो सैनिकों ने प्रशिक्षित किया है। अलबत्ता अफगानिस्तान के मौजूदा संकट में दो तथ्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती। एक तो यही कि अशरफ गनी ने बेहद चुनौतीपूर्ण समय में नेतृत्व संभाला है, और उनमें मुल्क के तमाम कबीलाई समूहों को साधे रखने की वैसी क्षमता नहीं है, जैसी पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई में थी। दूसरा यह कि आईएस के अफगानिस्तान में पैठ बना लेने के बाद तालिबान की यह आक्रामकता वर्चस्व की लड़ाई में आगे बढ़ने की होड़ भी हो सकती है।
तालिबान की मौजूदा आक्रामकता को न सिर्फ पिछले एक दशक में सबसे भीषण बताया जा रहा है, बल्कि इस साल के शुरुआती चार महीनों में आतंकी हिंसा में वहां करीब एक हजार नागरिकों ने जान गंवाई है। लिहाजा अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति पूरी दुनिया के लिए चिंतित करने वाली होनी चाहिए।