कोई सरकार नैतिकता की कितनी कम परवाह कर सकती है, यह मनमोहन सिंह सरकार से सीखा जा सकता है, जो कोयला घोटाले पर सर्वोच्च न्यायालय की सख्त फटकार के बावजूद किसी 'कार्रवाई' के लिए शीर्ष अदालत के अगले फैसले का इंतजार कर रही है!
सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा है कि सरकार ने भरोसा तोड़ा है और हमारी जांच की बुनियाद हिल गई है, लेकिन कांग्रेस इसे सरकार के लिए दुखद टिप्पणी से अधिक नहीं मानती। बावजूद इसके कि इस पूरे प्रसंग से शर्मसार सरकार के एक वरिष्ठ कानूनी अधिकारी को इस्तीफा देना पड़ा है।
लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर यूपीए अध्यक्ष के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में घोटाले जिस निरंतरता के साथ सामने आए हैं, उन पर लीपापोती की तत्परता उतनी ही देखने लायक है।
इसीलिए आने वाले दिनों में यदि वह कानून मंत्री का इस्तीफा ले लेती है, तब भी उसकी छवि पर लगी कालिख नहीं धुलने वाली, क्योंकि कोल ब्लॉक आवंटन में घोटाले का सच सामने आने के बाद से उसने लगातार इसे झुठलाने की कोशिशें की हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की पूरी रिपोर्ट तैयार कर सीधे सौंपने का निर्देश दिया था। लेकिन सरकार ने न सिर्फ सीबीआई की इस रिपोर्ट में मनमुताबिक बदलाव किए, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय और संसद-दोनों को अंधेरे में रखा!
उसके कानूनी अधिकारी ने जहां शीर्ष अदालत से झूठ बोला कि रिपोर्ट में हस्तक्षेप नहीं किया गया है, वहीं संसद में यह दलील दी गई कि सरकार ने सीबीआई की रिपोर्ट में सिर्फ व्याकरण की गलतियां दुरुस्त की है।
पर सीबीआई की प्रगति रिपोर्ट को कानून मंत्री के अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के अधिकारियों से साझा करना सिर्फ व्याकरण की गलतियां दुरुस्त करने का मामला नहीं हो सकता था।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पहले ही घिरी हुई जो सरकार अपने सहयोगियों को निशाना बनाकर पाक-साफ बनी रहती है और आधी जेपीसी के विरोधी हो जाने के बावजूद गलती नहीं स्वीकारती, हो सकता है कि शीर्ष अदालत के अगले फैसले के बाद भी उसका नैतिक विवेक न जागे।
वैसे में भ्रष्ट और अनैतिक होने की यह पराकाष्ठा अगले चुनाव में उसके पराभव की पटकथा लिख सकती है।