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घिरी हुई सरकार

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कोल ब्लॉक आवंटन तथा 2 जी स्पेक्ट्रम पर मुश्किल में फंसी यूपीए सरकार को कैग की ताजा रिपोर्ट ने एक और धक्का दिया है। मनरेगा में घोटाले का रहस्योद्घाटन बेशक नया नहीं है, लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना में हजारों करोड़ रुपये की बंदरबांट यूपीए की चुनावी संभावनाओं को नुकसान तो पहुंचाएगी ही।
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अलबत्ता 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक आवंटन मामलों में सरकार की कलई खुलने से तो बजट सत्र के दूसरे चरण का कामकाज ही पूरी तरह बाधित होने के आसार हैं। यह संयोग नहीं कि 2 जी मामले में सरकार के रवैये की पोल खोलती पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा की सौ पेज की टिप्पणी और कोल ब्लॉक आवंटन में पारदर्शिता का अभाव बताती स्थायी समिति की रिपोर्ट एक ही दिन सार्वजनिक हुई है।

2 जी मामले में जेपीसी के मुखिया पीसी चाको के रवैये से पहले ही साफ हो गया था कि वह प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को बचाना चाहते हैं। विपक्ष के लगातार दबाव के बावजूद न तो इन जिम्मेदार मंत्रियों को और न ही तत्कालीन दूरसंचार मंत्री को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया। पर अब खुद ए राजा की ओर से स्थिति साफ की गई है कि नीलामी में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को सारी जानकारियां थीं।
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सिर्फ यही नहीं कि द्रमुक और तृणमूल की समर्थन वापसी से जेपीसी में यूपीए का बहुमत नहीं है, बल्कि भाजपा, वाम दल, द्रमुक और सपा की नाराजगी तथा पीसी चाको को पद से हटाने की उनकी मांग को देखते हुए जेपीसी की रिपोर्ट के संसद में पेश होने पर ही संदेह है।

इसी तरह कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी सीबीआई की जांच रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में पेश किए जाने से पहले सरकार पर उसमें बदलाव करने के जो आरोप लगे हैं, वे काफी गंभीर हैं और सांविधानिक संस्थाओं के कामकाज में दखल देने की उसकी दुष्प्रवृत्ति का ही सुबूत देते हैं।

यदि सीबीआई इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय को सच बता देती है, तो सरकार की छवि और खराब होगी। मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगने की भाजपा की मांग पर सोनिया गांधी का सख्त रुख अपनी जगह है, लेकिन इस पूरे प्रसंग में सबसे ज्यादा किरकिरी प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय की ही हो रही है।
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