भारत में यों तो दशकों से सैकड़ों की संख्या में फिल्में बनती रही हैं, लेकिन कोई एक दशक में उसका फलक काफी बढ़ा है और उसमें विविधताएं भी देखने को मिली हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि नए फिल्मकारों ने समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा के बीच के अंतर को खत्म कर दिया है। 62वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए चुने गए कलाकार, फिल्मकार और उनकी फिल्में इसी बदलते दौर के भारतीय सिनेमा को रेखांकित करते हैं।
मसलन, क्वीन फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली कंगना रनौत को ही लें, तो उन्होंने हिंदी में सर्वश्रेष्ठ चुनी गई इस फिल्म में अपने किरदार के जरिये लड़कियों को अपना आकाश चुनने के लिए प्रेरित किया है। विवाह से महज दो दिन पहले भावी पति द्वारा रिश्ता तोड़ देने की घटना हमारे समाज में नई नहीं है, लेकिन इस सदमे से कितनी लड़कियां उबर पाती हैं! हिमाचल प्रदेश के एक कस्बे से महज 16 वर्ष की उम्र में अपनी अलग राह बनाने वाली कंगना को इससे पहले फैशन के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिल ही चुका है।
इसी तरह 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर के अलगाववाद के दिनों के इर्द गिर्द बुनी गई फिल्म हैदर को देखा जा सकता है, जिसे विभिन्न श्रेणियों में पांच पुरस्कार मिले हैं। सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म के रूप में चुनी गई विश्व चैंपियन मुक्केबाज मैरीकॉम की जिंदगी पर बनी बायोपिक भी इसी बात की तस्दीक करती है कि फिल्मकार अब कहीं अधिक व्यावहारिक और समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करने वाले विषय चुन रहे हैं।
अपने समय और समाज से जुड़ते सिनेमा का सबसे बड़ा प्रमाण इस वर्ष चुनी गई सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म कोर्ट है, जिसमें अदालती विसंगतियों को शिद्दत से उठाया गया है। तो सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुने गए विजय ने नानू अवानल्ला अवालू नामक कन्नड़ फिल्म में ट्रांसजेंडर का किरदार निभाकर एक मार्मिक विषय को छुआ है। वास्तव में यदि फिल्मकार परिपक्व हुए हैं, तो दर्शक भी इससे पीछे नहीं हैं, जिसकी पुष्टि इस बात से होती है कि क्वीन, हैदर और मैरीकॉम ने बॉक्स आफिस पर भी खासी कमाई की है। यानी वह दिन लद गए, जब राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार को कोई ठीक से पहचानता तक नहीं था!