संसद में भाषण देते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार महाभारत की चर्चित टिप्पणी उद्धृत की थी-वह सभा सभा नहीं, जिसमें वृद्ध न हों! उसके करीब दो दशक बाद भाजपा के पूर्ण बहुमत के गौरवशाली दौर में वाजपेयी के साथ-साथ लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वृद्धजनों को संसदीय बोर्ड से विनम्र विदाई देकर पार्टी ने वाकई साहसी फैसला लिया है।
वाजपेयी की वक्तृत्व कला और समन्वयवादी राजनीति, आडवाणी का सांगठनिक कौशल और राम जन्मभूमि आंदोलन के जरिये पार्टी को सत्ता में पहुंचाने का करिश्मा और जोशी की बौद्धिक छवि ही अब तक भाजपा की पहचान रही है। लेकिन वाजपेयी की बीमारी की पृष्ठभूमि में विगत मई में जिस भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत हासिल की, उसमें आडवाणी और जोशी की सक्रियता न के बराबर थी। बल्कि वे भाजपा में आ रहे बदलाव पर आंखें मूंदे हुए थे।
तथ्य यह है कि भाजपा में संगठन से लेकर सरकार तक में कम उम्र लोगों को तरजीह दी गई है। यह समय की मांग भी है। खुद नए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पचास के आसपास के हैं। पर आडवाणी और जोशी क्या अब सलाह देने की स्थिति में भी नहीं हैं कि उन्हें एक ऐसे निकाय में रखा जाए, जिसके पास कोई अधिकार नहीं होगा? सवाल यह भी कि अगर वाकई युवाओं को महत्व देना है, तो अमित शाह की टीम में वरुण गांधी क्यों नहीं हैं।
इस फैसले के पीछे भाजपा पर संघ के बढ़ते दबाव और नरेंद्र मोदी के सर्वशक्तिशाली होकर उभरने की जो बात कही जा रही है, उसे बिल्कुल खारिज भी नहीं किया जा सकता। जाहिर है, भाजपा ने चर्चित त्रिमूर्ति को वर्तमान से बाहर कर अपने राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ा जोखिम भी मोल ले लिया है।
इसके बावजूद उसका यह साहसी फैसला तमाम पार्टियों के लिए संदेश तो है ही। माकपा को छोड़ दें, तो हाल के दौर में और किसी पार्टी में युवाओं को महत्व देने की ललक नहीं देखी गई; हालांकि वहां भी इस पर अमल कम ही हुआ है। राहुल गांधी के सामने आने के बाद कांग्रेस में पीढ़ीगत बदलाव की उम्मीद सर्वाधिक थी। लेकिन अपेक्षाकृत अधिक और समर्थ युवा चेहरे होने के बावजूद कांग्रेस के भीतर ऐसी कोई जरूरत महसूस नहीं हुई। अब भाजपा में लिए गए इस फैसले के बाद दूसरी पार्टियों पर कायांतरण का दबाव तो बढ़ेगा ही।