अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने भारत यात्रा से ठीक पहले जिस तरह से नरेंद्र मोदी सरकार की तारीफ की है और उसके साथ दीर्घकालीन सहयोग के संकेत दिए हैं, उससे दोनों देशों के बदलते रिश्ते की थाह ली जा सकती है। वास्तव में यह दोतरफा रिश्ता है, जिसमें दोनों देशों के हित निहित हैं।
यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में असैन्य परमाणु समझौते के ऐलान के समय दोनों देशों का जो रिश्ता परवान चढ़ा था, उसमें पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक तरह का ठंडापन आ गया था। अब ऐसा लगता है कि नई सरकार के साथ अमेरिका अपने रिश्ते में फिर से गरमाहट लाना चाहता है। उसकी ओर से दिखाया जा रहा उत्साह इसलिए भी ध्यान खींचता है, क्योंकि गुजरात दंगों के बाद से अमेरिका के दरवाजे नरेंद्र मोदी के लिए बंद हो गए थे।
लोकसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले तक वह मोदी को वीसा देने तक को तैयार नहीं था। हैरान होने की जरूरत नहीं है कि जिस अमेरिका को मोदी और राष्ट्रीय स्वयं संघ की नीतियां नहीं सुहा रही थीं, उसे अब मोदी सरकार की कथित 'भगवा क्रांति' में ऊर्जा के प्रतीक नजर आ रहे हैं। भारतीय विदेश मंत्री के साथ पांचवी सालाना रणनीतिक वार्ता के लिए भारत आ रहे जॉन केरी ने मोदी सरकार की 'सबका साथ सबका विकास' की नीति का समर्थन किया है।
दरअसल विश्व व्यापार संगठन में भारतीय रुख का विरोध कर रहे अमेरिका को यदि भारत में संभावनाएं दिख रही हैं, तो इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी कंपनियों के लिए उपलब्ध असीमित संभावनाएं हैं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि अमेरिका अपने हितों को लेकर बेहद सजग है फिर वह रक्षा, व्यापार या ऊर्जा क्षेत्र की बात हो। केरी इन तीनों क्षेत्रों में दीर्घकालीन साझेदारी की बात कर रहे हैं।
यह भी समझने की जरूरत है कि अमेरिका अब और रुकने को तैयार नहीं है, जैसा कि केरी के साथ आ रहे प्रतिनिधिमंडल को देख कर समझा जा सकता है। इसमें वहां के वाणिज्य मंत्री के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि भी होंगे।
इसके अलावा सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री भी भारत आने वाले हैं। इस तेजी के बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और भारत के बीच बौद्धिक संपदा कानून और सब्सिडी के मुद्दे पर मतभेद हैं। यह ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे भारत के हित जुड़े हैं और जिनसे समझौता नहीं किया जा सकता।