सत्ता राजनीति में असंतोष के उदाहरण नए नहीं हैं, लेकिन पारदर्शिता के नाम पर बनी एक राजनीतिक पार्टी में आरोप-प्रत्यारोपों का इतनी जल्दी सार्वजनिक प्रदर्शन जितना दुखद है, उतना ही चिंतनीय भी।
विनोद कुमार बिन्नी ने आप नेतृत्व पर जो आरोप लगाए हैं, उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन फिलहाल इन सबके पीछे उनकी कुंठा ही दिखती है। पिछली बार बागी तेवर उन्होंने तब दिखाए थे, जब उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया था, और अब वह पार्टी के इस फैसले के बाद क्षुब्ध हैं, जिसमें किसी विधायक को लोकसभा का टिकट न देने पर आम सहमति बनी है। यह संभव है कि अनुभवी राजनेता बिन्नी की रुचि सत्ता से दूर रहकर ईमानदारी की लड़ाई लड़ने में उतनी न हो। पर अगर वह किसी वजह से नाराज हैं, तो नेतृत्व से बात करनी चाहिए थी।
मीडिया में पार्टी की नीतियों के खिलाफ उनके मुखर होने से गलत संदेश गया है। अलबत्ता राजनीति में अपने नौसिखिएपन के कारण ज्यादा चर्चा में आई आप इस विवाद को एक विधायक का असंतोष मानकर चुप बैठ जाती है, तो बड़ी गलती कर रही होगी। एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर उसके अंतर्विरोध कम नहीं हैं।
दिल्ली के नागरिकों से बिजली का बिल न भरने की अपील करने वाले, सत्ता में आने पर हर घर में पानी पहुंचाने, बिजली का बिल आधा करने और पंद्रह दिन में जनलोकपाल विधेयक पारित कराने का वायदा करने वाले अरविंद केजरीवाल को अब एहसास हो रहा होगा कि आंदोलन करने और सरकार चलाने में बहुत फर्क है। वैचारिकता और ज्वलंत मुद्दों को दरकिनार कर केवल भ्रष्टाचार-विरोध को आधार बनाकर राजनीति संभव नहीं, यह भी अब प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, मल्लिका साराभाई, कैप्टन गोपीनाथ आदि के रुख से समझ में आ जाना चाहिए।
बेशक पार्टी में आ रहे तमाम लोग ईमानदारी के पैरोकार नहीं हैं, पर कामकाज सुधारने, सबको समान महत्व देने और पार्टीगत अनुशासन बनाने पर वह ध्यान नहीं देगी, तो उसका प्रभामंडल बिखरते देर न लगेगी। आप की कुछ बैठकों में दिखी अव्यवस्था, निशाने पर आए उसके कुछ मंत्री और दिल्ली में एक विदेशी महिला के साथ हुए सामूहिक बलात्कार को मुद्दा बनाकर कांग्रेस का आंदोलन में उतरना बताता है कि उसके लिए आने वाले दिन चुनौती भरे होने वाले हैं।