भारतीयों के स्विस बैंकों में जमा काले धन का पता लगाने और उसे वापस लाने के पक्ष में हाल के वर्षों में जितनी आवाजें उठी हैं, खुद सरकार की ओर से भी अगर उतनी ही प्रतिबद्धता का परिचय दिया जाता, तो शायद आज तस्वीर कुछ और होती। संसद में काले धन पर श्वेतपत्र जारी हो चुका है। खुद सर्वोच्च न्यायालय सरकार के उदासीन रवैये पर नाराजगी जता चुका है।
इन सबके बीच वित्त मंत्री पी चिदंबरम अब स्विस वित्त मंत्री की जवाबी चिट्ठी का जिक्र कर जो बताना चाह रहे हैं, वह बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं है। बैंकिंग क्षेत्र में गोपनीयता का दौर खत्म जाने के बावजूद स्विस सरकार जिस दुराग्रह का परिचय दे रही है, और भारत के साथ हुए दोहरा कराधान अपवंचन समझौते तक को जिस तरह अंगूठा दिखा रही है, वह हैरान करने वाली तो है। पर हकीकत यही है कि प्रतिरोध करने के बजाय हमारी सरकार ने इसे अपने बचाव का तर्क बना लिया है। वरना स्विस सरकार की शिकायत लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों में जाने से लेकर उसके खिलाफ सख्त कदम उठाने के अनेक विकल्प हैं।
काले धन के खिलाफ वह इतनी ही प्रतिबद्ध होती, तो न इस संदर्भ में शीर्ष न्यायालय की पहल को गैरजरूरी बताती, न ही स्विस बैंकों के खाताधारकों के बारे में जानकारी मिलने के बावजूद खुलासा करने से बचती। अलबत्ता विपक्ष विदेशों में जमा काले धन को जैसा भावुक मुद्दा बना रहा है, उससे भी सहमत नहीं हुआ जा सकता। विदेशों में जितना काला धन है, अपने यहां रीयल एस्टेट, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र और सोना आयात में उससे अधिक काला धन खपा हुआ हो, तो आश्चर्य नहीं। और इस चुनाव में किस पैमाने पर काला धन लगा है, उसका पता देश के अलग-अलग हिस्सों में जब्त किए जा रहे करोड़ों रुपये से चलता है।
जो नरेंद्र मोदी सत्ता में आने पर काला धन वापस लाने का वायदा कर रहे हैं, खुद उनके चुनाव प्रचार में हो रहे बेतहाशा खर्च पर भी उंगलियां उठाई ही जा रही हैं। इसलिए सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, वह स्वतः काले धन के तंत्र को बेनकाब करने की पहल करेगी, इसका बहुत भरोसा नहीं है। लेकिन सजगता, पारदर्शिता और अदालती सक्रियता के इस दौर में वह लंबे समय तक अपनी निष्क्रियता का बचाव भी तो नहीं कर पाएगी।