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आत्मविश्वास की अग्नि

Sun, 01 Feb 2015 08:05 PM IST
नई दिल्ली
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भारत जैसे देश की मजबूती सिर्फ उसके पारदर्शी लोकतंत्र से या केवल उसकी विराट अर्थव्यवस्था से नहीं मापी जा सकती, अंतर महाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल अग्नि-5 के कैनिस्टर संस्करण का सफल परीक्षण बताता है कि रक्षा क्षेत्र में भी हम उत्तरोत्तर एक शक्ति बनते जा रहे हैं।
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सरहदों पर चुनौतियों को देखते हुए रक्षा सेवा को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से मध्यम और लंबी दूरियों के प्रक्षेपास्त्र बनाने की जो शुरुआत हुई थी, वह आज इस ऊंचाई पर पहुंच सकी है, तो यह नेतृत्व की दूरदर्शी सोच और हमारे रक्षा वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम का फल है। इसी का सुखद परिणाम है कि आज हम मिसाइल सुपर पावर कहलाने वाले दुनिया के मुट्ठी भर देशों की श्रेणी में आ गए हैं।

एक टन से भी अधिक परमाणु विस्फोटक ले जाने की क्षमता रखने वाले अग्नि-5 के दायरे में चीन के अलावा पूरा यूरोप है। लेकिन इस तरह के प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण के पीछे सिर्फ सीमाओं पर बढ़ती चुनौती और तकनीकों के निरंतर विकास का तर्क नहीं होता, बल्कि ये किसी देश की बढ़ती शक्ति और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में उसकी धमक के भी सुबूत होते हैं।
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सामरिक क्षेत्र में हमारी यह उपलब्धि इसलिए भी बहुत बड़ी है कि इसकी तकनीक पूर्णतः स्वदेशी है। उल्लेखनीय है कि अग्नि-5 पर काम 2009 में शुरू हुआ था, और इससे पहले इसके दो सफल परीक्षण हो चुके थे। मगर उसके इस ताजा संस्करण की खासियत यह है कि इसका प्रक्षेपण कहीं से भी, सड़क या रेल मार्ग के जरिये ले जाकर, किया जा सकता है। देश के किसी भी हिस्से से दागे जा सकने और प्रक्षेपण के समय दुश्मन के उपग्रहों की निगाहों में न आने की विशेषताएं ही इसे इतना खास बनाती हैं।

हालांकि दुनिया भर में मिसाइलों के रेंज के लिहाज से देखें, तो 5,000 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता बहुत अधिक नहीं मानी जा सकती; अमेरिकी और इस्राइली प्रक्षेपास्त्रों की मारकता का दायरा इसके दूने से भी अधिक बताया जाता है। मगर जिस देश में मिसाइलों के निर्माण का सिलसिला डेढ़ दशक से अधिक पुराना नहीं है, और जो देश पहले हमला करने की नीति पर कतई यकीन नहीं करता, उसके लिए यह भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। अग्नि की यात्रा, जाहिर है, यहीं रुकने वाली नहीं है। देश को बाहरी खतरों से बचाने के लिए हमारे रक्षा वैज्ञानिकों को इससे भी ऊंची उड़ान भरनी पड़ेगी।
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