ब्रिसबेन में जी-20 सम्मेलन आधारभूत ढांचे में निवेश बढ़ाने और 2018 तक आर्थिक विकास दर में 2.1 फीसदी अतिरिक्त बढ़ोतरी करने के लक्ष्य के साथ संपन्न हो गया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन से पहले ब्रिक्स देशों के नेताओं के साथ बैठक में काला धन रखने वाले देशों के खिलाफ सख्ती बरतने की जरूरत बताई थी। कर सूचना आदान-प्रदान व्यवस्था बनाने और अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में जी-20 की प्रतिबद्धता को इसी से जोड़कर देखना चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जी-20 की बैठक में नरेंद्र मोदी काले धन के खिलाफ माहौल बनाने में सफल हुए हैं। लेकिन काला धन और कर चोरी जैसे मुद्दे आर्थिक सुस्ती से उबरती विकसित दुनिया के लिए भी उतनी ही चिंता का विषय हैं। उदाहरण के लिए, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जाने वाली कर चोरी के खिलाफ ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टॉनी एबोट ने भी आक्रामक कार्रवाई की आवश्यकता जताई ही। वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुस्ती से उबारते हुए रोजगार बढ़ाने की चिंता सम्मेलन में मुखर भी हुई। अलबत्ता इस सम्मेलन में भी राजनीतिक विवाद आर्थिक प्रतिबद्धताओं पर जिस तरह भारी पड़ा, वह कोई सुखद संदेश नहीं है।
जी-20 की छवि पूंजी और सामान की आवाजाही का अवरोध हटाने के लिए समर्पित संगठन की रही है। पर लगातार दूसरी बार कटु राजनीतिक विवाद ने इस बैठक पर जिस तरह असर डाला, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। पिछली बार यह सम्मेलन सीरिया पर रूसी-अमेरिकी खेमेबंदी के कारण अपने मकसद से भटक गया था, तो इस बार मलयेशियाई विमान त्रासदी और यूक्रेन के मुद्दे पर रूस को ब्रिटेन और अमेरिका की ऐसी आलोचना सुननी पड़ी कि राष्ट्रपति पुतिन सम्मेलन खत्म होने से पहले ही चले गए।
शिखर बैठक में इबोला को एक विकट चुनौती के रूप में स्वीकारा तो गया, पर उससे निपटने की सामूहिक प्रतिबद्धता नहीं दिखाई पड़ी। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन को एजेंडे से बाहर रखने के एबोट के फैसले को भी पसंद नहीं किया गया। आर्थिक सुधारों को राजनीति से परे होना ही चाहिए। लेकिन आपसी सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से गठित क्षेत्रीय और वैश्विक संगठन निरंतर जिस तरह राजनीतिक विवादों का मंच बनते जा रहे हैं, वह वाकई बहुत चिंतनीय है।