मोदी सरकार के सौ दिनों का रिपोर्ट कार्ड इस धारणा को गलत साबित करता है कि इतने कम समय में किसी सरकार का मूल्यांकन संभव नहीं। इस दौरान सरकार ने कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश बढ़ाने का कदम उठाया, डिजिटल इंडिया और महिला सुरक्षा पर जोर दिया तथा सभी परिवारों के लिए बैंक खाता खोलने का काम शुरू कर वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया।
इसके साथ ही गैरजरूरी मंत्रालयों और योजना आयोग को खत्म करने, रेल भाड़ा बढ़ाने और डब्ल्यूटीओ में भारतीय किसानों के साथ समझौता न करने जैसे फैसले सरकार के साहस के बारे में बताते हैं। प्रशासनिक चुस्ती और योजनाबद्ध तैयारी का नतीजा आर्थिक विकास दर और सेंसेक्स में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देता है, तो भाजपा के नए सांसदों-मंत्रियों के बावजूद संसदीय कामकाज में सुधार उम्मीद जगाता है।
परिचितों-रिश्तेदारों को महत्वपूर्ण पद न देने और मंत्रियों-अधिकारियों को ईमानदारी से काम करने की सलाह देने की बात कहकर प्रधानमंत्री ने सरकार की एक गंभीर छवि बनाई है, जिससे भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर अंकुश लगने की संभावना बनी है। इतने कम समय में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रधानमंत्री एक मजबूत शख्सियत के तौर पर उभरे हैं, तो यह बड़ी बात है।
इन सौ दिनों में नाउम्मीदी की फेहरिस्त भी कोई कम नहीं। तमाम उपायों के बावजूद महंगाई घटी नहीं है, काले धन मामले में ठोस सफलता हाथ नहीं लगी है, पाक आक्रामकता पर अंकुश लगाने का प्रयास हुआ नहीं है और आर्थिक मोर्चे पर पिछली सरकार की नीतियों को ही आगे बढ़ाने की कोशिश दिखती है।
इसी तरह सांप्रदायिक सद्भाव की कमजोर पड़ती भावना, उच्च शिक्षा में गैरजरूरी हस्तक्षेप और राज्यों तथा न्यायपालिका के साथ केंद्र सरकार के रिश्ते चिंता बढ़ाने वाले ही हैं। खुद मोदी के कामकाज में निरंकुशता की झलक है, जो कैबिनेट को महत्वहीन बनाने में ही नहीं, मंत्रियों पर नजर रखने और उनके कामकाज में दखल देने में भी सामने आई है।
शुरुआत में कुछ मंत्रियों की टिप्पणियां विवाद का विषय बनीं, तो पिछले दिनों गृह मंत्री के साथ प्रधानमंत्री के असहज रिश्ते की खबर ने सरकार की छवि पर असर डाला है। ऐसे में, सरकार के सामने केवल अपनी छवि सुधारने की ही नहीं, कतार के आखिरी व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की बड़ी चुनौती भी है।